पुणे कांड से दहला महाराष्ट्र: शक्ति कानून लागू होता तो दरिंदों में होता खौफ - अनिल देशमुख
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पुणे के नसरापुर और चाकण में हुई दो मासूमों की नृशंस हत्या ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है। राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है और विपक्ष ने इसे लेकर सरकार को घेरे में लेना शुरू कर दिया है। पूर्व गृहमंत्री और राकांपा (शरद पवार गुट) के नेता अनिल देशमुख ने इन घटनाओं को शर्मनाक करार देते हुए ‘शक्ति कानून’ को लेकर बड़ा दावा किया है।

दरिंदों को मिले तत्काल फांसी मुंबई में पत्रकारों से बात करते हुए देशमुख ने कहा कि पुणे की घटना ने मानवता को शर्मसार कर दिया है। उन्होंने कहा, ऐसे अपराधियों को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है। हमारी मांग है कि कानूनी प्रक्रिया को फास्ट-ट्रैक पर चलाकर दोषियों को जल्द से जल्द फांसी दी जाए।

क्यों ठंडे बस्ते में है शक्ति कानून ? अनिल देशमुख ने याद दिलाया कि जब महाविकास अघाड़ी (MVA) की सरकार थी, तब उन्होंने गृहमंत्री के तौर पर शक्ति कानून का मसौदा तैयार किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून को दोनों सदनों से सर्वसम्मति से पारित कराने के बाद केंद्र के पास भेजा गया था, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे लंबे समय तक मंजूरी नहीं दी। देशमुख के अनुसार, वर्तमान राज्य सरकार ने भी इस कानून को धरातल पर उतारने के लिए कोई ठोस इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है।

क्या है शक्ति कानून की खासियत? आंध्र प्रदेश के दिशा कानून की तर्ज पर तैयार इस कानून में कई कड़े प्रावधान हैं:

देशमुख का स्पष्ट मानना है कि अगर राज्य में शक्ति कानून लागू होता, तो अपराधियों के मन में कानून का डर होता। उन्होंने कहा कि कानून की अनुपस्थिति और ढिलाई ही अपराधियों का साहस बढ़ा रही है।

न्याय में देरी, न्याय का इनकार पुणे की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि केवल गिरफ्तारी काफी नहीं है। नसरापुर कांड का आरोपी भीमराव कांबले पहले भी दो बार जेल जा चुका था, लेकिन कानूनी खामियों का फायदा उठाकर वह बाहर आ गया। देशमुख का तर्क है कि जब तक सजा त्वरित और कठोर नहीं होगी, तब तक समाज में सुरक्षा का भाव पैदा करना मुमकिन नहीं है।

अब यह मामला राजनीतिक गलियारों में गरमा गया है। सवाल यह है कि क्या सरकार विपक्ष की इस मांग को गंभीरता से लेगी और शक्ति कानून को प्रभावी ढंग से लागू कर राज्य की बेटियों को सुरक्षा का कवच प्रदान करेगी?

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