संसद का विशेष सत्र एक ऐतिहासिक मोड़ पर है, जहां महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा छिड़ी है। हालांकि, इस नेक काम में भी अब धर्म और वर्ग का एंगल जोड़कर इसे विवादित बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। समाजवादी पार्टी ने मांग उठाई है कि महिला आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए भी कोटा तय हो।
आरक्षण का संवैधानिक आधार क्या है? भारतीय संविधान में आरक्षण का वर्तमान स्वरूप स्पष्ट है। लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीटें SC और 47 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं, जो कुल सीटों का लगभग 24% है। यह प्रावधान अनुच्छेद 330 के तहत आता है। इसके अलावा, किसी भी धर्म या जाति के आधार पर लोकसभा में आरक्षण का प्रावधान नहीं है। महिला आरक्षण बिल में भी इसी 24% वाले फॉर्मूले को अपनाकर SC-ST महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था है।
30 साल से फंसा है बिल, वजह क्या है? महिला आरक्षण बिल पहली बार 1996 में पेश हुआ था, लेकिन तब OBC कोटे की मांग ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। 2010 में राज्यसभा से पास होने के बावजूद, यही मांग लोकसभा में बाधा बन गई। अब जब 30 साल बाद इस पर फिर चर्चा हो रही है, तो धर्म का मुद्दा उठाकर नए सिरे से अड़चनें डाली जा रही हैं।
क्या संविधान धर्म आधारित आरक्षण की इजाजत देता है? संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि धर्म के आधार पर आरक्षण देश की अखंडता के लिए घातक है और यह समाज में विभाजन पैदा करेगा। इसके बावजूद, कुछ पार्टियां केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए इस मांग को उठा रही हैं।
क्या यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है? समाजवादी पार्टी का रिकॉर्ड खुद इस मांग के विरोधाभासी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने कुल महिला उम्मीदवारों का केवल 10% टिकट मुस्लिम महिलाओं को दिया था। 2022 के विधानसभा चुनावों में भी यही आंकड़ा रहा। जो पार्टी खुद मुस्लिम महिलाओं को टिकट देने में कंजूसी बरतती है, उसकी संसद में यह मांग केवल राजनीतिक नौटंकी और तुष्टीकरण का हिस्सा लगती है।
कट्टरपंथ का डर और महिलाओं की भागीदारी आरक्षण का विरोध करने वाले कट्टरपंथियों को डर है कि मुस्लिम महिलाएं राजनीति में आगे न आ जाएं। मौलानाओं के बयान कि राजनीति महिलाओं के लिए दलदल है, इस संकीर्ण मानसिकता को दर्शाते हैं। जबकि रजिया सुल्तान से लेकर महबूबा मुफ्ती तक, भारत के इतिहास में मुस्लिम महिलाओं ने नेतृत्व का लोहा मनवाया है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में, जहां कट्टरपंथ का प्रभाव गहरा है, वहां भी बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना और खालिदा जिया जैसी नेताओं ने दशकों तक सत्ता संभाली है। फिर भारत के कुछ मौलाना क्यों चाहते हैं कि मुस्लिम महिलाएं घर की चारदीवारी में ही रहें? यह सवाल पूरी तरह से उनकी नीयत पर सवाल खड़े करता है।
#DNAमित्रों | महिला हक का मुद्दा..मजहब पर क्यों आया?..किसकी नीयत में खोट ..किसकी नीयत में वोट ?
— Zee News (@ZeeNews) April 16, 2026
महिला आरक्षण में तुष्टीकरण का एंगल क्यों?#DNA #DNAWithRahulSinha #Loksabha #WomenReservation @RahulSinhaTV pic.twitter.com/yGQupQW9W3
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