परिसीमन 2026: उत्तर-दक्षिण के बीच सीटों का महा-संग्राम , आखिर क्यों भड़के हैं दक्षिणी राज्य?
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संसद के विशेष सत्र में पेश किए गए परिसीमन विधेयक 2026 ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। इस बिल के अनुसार, लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। लेकिन यह बदलाव उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक गहरी खाई पैदा करता दिख रहा है।

डेमोग्राफिक पेनाल्टी: नीति का पालन बना सजा?

तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों का कहना है कि उन्होंने दशकों से परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है। उनका तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रित रखने का इनाम मिलने के बजाय, उन्हें कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर सजा दी जा रही है।

उत्तर बनाम दक्षिण: सीटों का असंतुलन

अनुमान है कि परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटों में भारी उछाल आएगा। वहीं, दक्षिणी राज्यों का कुल सीटों में हिस्सा कम हो जाएगा। इससे डर है कि केंद्र सरकार बनाने में उनकी भूमिका गौण हो जाएगी और सत्ता का केंद्र पूरी तरह उत्तर भारत की ओर झुक जाएगा।

संघीय ढांचे और वित्तीय नुकसान का डर

विपक्षी नेताओं का आरोप है कि यह बिल भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है। राज्यों को यह भी चिंता है कि टैक्स का बंटवारा जनसंख्या के आधार पर होने के कारण, उनकी वित्तीय सौदेबाजी की ताकत भी कमजोर हो जाएगी। इसे वे अपने अधिकारों पर सीधा हमला मान रहे हैं।

चिदंबरम का दावा: प्रतिनिधित्व में भारी गिरावट

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने गणित समझाते हुए कहा कि वर्तमान में दक्षिणी राज्यों का संसद में 24.3% प्रतिनिधित्व है, जो परिसीमन के बाद घटकर 20.7% रह सकता है। उन्होंने दावा किया कि जहाँ उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 140 तक पहुँच सकती हैं, वहीं दक्षिण के राज्यों की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रहेगी।

सड़कों पर विरोध और सियासी बयानबाजी

विरोध की आंच जमीन पर भी दिखने लगी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने बिल की प्रतियां जलाकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। वहीं, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं जारी हैं।

टीडीपी का रुख: एक पेचीदा मोड़

इस पूरे मामले में एक दिलचस्प मोड़ आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी टीडीपी (TDP) का है। एनडीए गठबंधन का हिस्सा होने के नाते टीडीपी इस बिल का समर्थन कर रही है। उनका तर्क है कि सीटों में प्रस्तावित 50% वृद्धि को संतुलित तरीके से डिजाइन किया गया है, ताकि किसी भी क्षेत्र की आवाज दबाई न जा सके।

फिलहाल, यह परिसीमन विधेयक एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य का संवैधानिक सिद्धांत, राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन की मांग से टकरा रहा है। क्या सरकार इस पर आम सहमति बना पाएगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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