लोकसभा में महासंग्राम: महिला आरक्षण बिल पर बंटा सदन, 86 NDA सांसदों की गैर-मौजूदगी ने बढ़ाई हलचल
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देश के विशेष संसद सत्र, 2026 में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक ने सियासी पारे को चरम पर पहुंचा दिया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से पेश किए गए इस बिल ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक गहरी खाई खोद दी है। हालांकि इसे शुरुआती वोटिंग में मंजूरी मिल गई है, लेकिन इसके पीछे के आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

वोटिंग के आंकड़े और सत्ता का गणित लोकसभा में हुई वोटिंग में कुल 333 सांसदों ने हिस्सा लिया। इनमें से 207 सांसदों ने बिल के समर्थन में हां कहा, जबकि 126 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा NDA के 86 सांसदों का सदन से नदारद रहना है। यह अनुपस्थिति महज एक संयोग है या अंदरूनी असहमति, इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

क्या है 131वां संशोधन विधेयक? इस बिल का मुख्य उद्देश्य लोकसभा सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करना है। प्रस्ताव के अनुसार, इनमें से करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। सरकार का तर्क है कि इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का एक नया युग शुरू होगा। हालांकि, इसकी शर्तें ही विवाद का सबसे बड़ा कारण बनी हुई हैं।

परिसीमन और जनगणना का फंसा पेंच विवाद का असली केंद्र जनगणना है। सरकार 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन और महिला आरक्षण लागू करने की जल्दी में है, ताकि इसे फौरन लागू किया जा सके। वहीं, विपक्ष इसे 2021 की जनगणना के बाद ही करने की मांग कर रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जल्दीबाजी में राज्यों के प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगाड़कर राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है।

विपक्ष का कड़ा रुख कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया है कि पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार की संदिग्ध मंशा के खिलाफ है। असदुद्दीन ओवैसी और टीआर बालू जैसे नेताओं ने भी सदन में इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार प्रक्रिया को दरकिनार कर इसे थोपना चाहती है।

निश्चित रूप से कठिन है डगर संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में विशेष बहुमत अनिवार्य है। कुल सदस्यों का 50% से अधिक और उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई मत मिलना जरूरी है। ऐसे में, यदि विपक्ष अपनी एकता बनाए रखता है, तो सरकार के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। यह बिल केवल महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य के राजनीतिक संतुलन और राज्यों की हिस्सेदारी की एक बड़ी लड़ाई बनकर उभरा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा आगामी चुनावों का सबसे बड़ा चुनावी हथियार भी साबित हो सकता है।

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