इस्लामाबाद में हाई-वोल्टेज डिप्लोमेसी: ईरान-अमेरिका के बीच आर-पार की जंग या शांति का रास्ता?
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मध्य-पूर्व में जारी तनाव अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल इस समय पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आमने-सामने हैं। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक खींचतान सैन्य टकराव की दहलीज पर खड़ी है।

लेबनान सीजफायर: बातचीत की पहली शर्त ईरान ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ का कहना है कि जब तक लेबनान में पूर्ण सीजफायर लागू नहीं होता, अमेरिका के साथ किसी भी तरह की सार्थक बातचीत संभव नहीं है। साथ ही, ईरान ने अपने फ्रीज किए गए फंड्स को बहाल करने की मांग को भी अपनी प्राथमिकता में रखा है।

इस्लामाबाद में जुटी दिग्गजों की फौज इस हाई-लेवल बैठक का आयोजन पाकिस्तान में किया जा रहा है। अमेरिका का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जिसमें जेरेड कुशनर जैसे करीबी सलाहकार भी शामिल हैं। ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची और गालिबाफ कमान संभाले हुए हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी इस प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।

ट्रम्प की कड़ी चेतावनी बैठक के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आक्रामक तेवर अपनाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि ईरान के साथ डील नहीं होती है, तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के इस्तेमाल से पीछे नहीं हटेगा। ट्रम्प ने होर्मुज स्ट्रेट को किसी भी कीमत पर खुला रखने की बात कही है, चाहे उसके लिए ईरान का सहयोग मिले या न मिले।

मेज पर चार बड़े कांटेदार मुद्दे वार्ता के दौरान चार संवेदनशील बिंदुओं पर गहन चर्चा होने की संभावना है:

  1. परमाणु कार्यक्रम: ईरान के यूरेनियम संवर्धन पर लगाम लगाना।
  2. होर्मुज स्ट्रेट: वैश्विक तेल आपूर्ति के इस अहम मार्ग पर नियंत्रण का विवाद।
  3. मिसाइल प्रोग्राम: ईरान की लंबी दूरी की मिसाइलों पर प्रतिबंध की मांग।
  4. प्रतिबंध: ईरान द्वारा लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और फंड वापसी की मांग।

दुनिया की टिकी निगाहें संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने इस वार्ता को विश्व शांति के लिए बेहद महत्वपूर्ण करार दिया है। हालांकि, इजराइल की नई बस्तियों की नीति और ईरान का आक्रामक रुख इस वार्ता को जटिल बना रहा है। इस्लामाबाद में हो रही यह बैठक या तो मध्य-पूर्व में एक बड़े शांति समझौते का आधार बनेगी, या फिर अनिश्चितकालीन संघर्ष की नई शुरुआत करेगी। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस ऐतिहासिक कूटनीतिक पहल पर टिकी हैं।

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