पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को लेकर तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। टीएमसी विधायक अखिल गिरी ने हाल ही में विवादास्पद बयान देते हुए कहा कि रामराज की किसी को जरूरत नहीं है, हमें रामराज नहीं, ममता राज चाहिए। इस बयान ने देश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।
दिलचस्प बात यह है कि अखिल गिरी स्वयं एक ऐसे विधानसभा क्षेत्र (रामनगर) से विधायक हैं, जिसका नाम ही भगवान राम के जुड़ा हुआ है। इतना ही नहीं, अखिल और गिरी जैसे उपनाम सीधे तौर पर सनातन और शंकराचार्य की संन्यासी परंपरा से जुड़े हैं। चौथी बार विधायक बने और मंत्री रह चुके नेता का मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति यह रुख राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
महात्मा गांधी ने 1929 में स्पष्ट किया था कि राम राज्य का मतलब हिंदू राज नहीं, बल्कि ईश्वर का राज्य है, जहां न्याय, प्रेम और समानता का शासन हो। गांधी के अनुसार, राम राज्य वह है जहां सरकार नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न करे। इसके विपरीत, टीएमसी के नेताओं का ममता राज का दावा गांधीवादी आदर्शों से मेल खाता नहीं दिखता।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बयान के पीछे वोट बैंक का कड़ा गणित है। जिस रामनगर सीट से अखिल गिरी चुनाव जीतते हैं, वहां 89% हिंदू आबादी है। बंगाल में कुल 27% मुस्लिम मतदाता हैं। आलोचकों का आरोप है कि अखिल गिरी जैसे नेता जानबूझकर सनातनी प्रतीकों का अपमान करते हैं ताकि एक विशेष वर्ग के वोट को एकजुट किया जा सके। ममता बनर्जी स्वयं रामराज की बात करती हैं, लेकिन उन्हीं की पार्टी के नेताओं का यह विरोधाभासी व्यवहार जनता को असमंजस में डालता है।
पश्चिम बंगाल सरकार के बजट पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। राज्य बजट में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसों के लिए 5,713 करोड़ रुपये का भारी-भरकम प्रावधान किया गया है, जबकि उद्योग, वाणिज्य और श्रम विभाग के बजट इससे कहीं कम हैं। सामूहिक शिक्षा और पुस्तकालय के लिए मात्र 366 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए हैं। विरोधी इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा बता रहे हैं।
हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल के लिए बीजेपी का संकल्प पत्र जारी किया। इसमें समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने, घुसपैठ रोकने और गो-तस्करी पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने का वादा किया गया है। साथ ही, तृणमूल सरकार के पिछले 15 वर्षों के कार्यकाल पर श्वेतपत्र लाने की बात कही गई है।
अब फैसला बंगाल की जनता पर है। एक तरफ टीएमसी का मॉडल है जिसे अखिल गिरी जैसे नेता ममता राज कहते हैं, और दूसरी ओर बीजेपी का भरोसे का वादा। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में यह स्पष्ट हो जाएगा कि बंगाल के लिए आदर्श शासन की परिभाषा क्या है।
*#DNAमित्रों | ममता राज में मालदा के हिंदू कैसे जीते हैं? बंगाल के मालदा से दंगा पीड़ितों की गवाही#DNA #DNAWithRahulSinha #WestBengal #TMC #MamataBanerjee@RahulSinhaTV pic.twitter.com/46z8WeACcd
— Zee News (@ZeeNews) April 10, 2026
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