कैश कांड की आंच: महाभियोग की तैयारी के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा
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नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया है। उनके खिलाफ चल रहे कथित कैश कांड और संसद में महाभियोग की बढ़ती सरगर्मियों के बीच यह बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला? विवाद की शुरुआत 15 मार्च 2025 को हुई थी, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से 500 रुपये के जले और अधजले नोट बरामद किए गए थे। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद जस्टिस वर्मा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। हालांकि, उन्होंने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ एक बड़ी साजिश करार दिया था।

संसद तक पहुंचा मामला कैश कांड का यह विवाद केवल अदालती गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद तक जा पहुंचा। बीते मानसून सत्र में 145 लोकसभा सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों गुटों के दिग्गज नेता शामिल थे। अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल जैसे नेताओं के हस्ताक्षर वाले ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी।

आंतरिक जांच और तबादला मामले की गंभीरता को देखते हुए 22 मार्च 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक आंतरिक जांच शुरू की थी। इसके लिए तीन न्यायाधीशों का एक पैनल भी गठित किया गया था। जांच के दौरान, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट करने की सिफारिश की। इस सिफारिश को केंद्र सरकार ने मंजूरी दी और 5 अप्रैल 2025 को जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में पदभार संभाला।

इस्तीफे की पृष्ठभूमि इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादले के बाद भी जस्टिस वर्मा विवादों के घेरे में रहे। उनके खिलाफ चल रही आंतरिक जांच और संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने की प्रबल संभावनाओं के बीच उन पर दबाव लगातार बढ़ रहा था। अंततः, शुक्रवार को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर न्यायाधीश के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त करने का निर्णय लिया। फिलहाल, उनके इस्तीफे के बाद कानूनी हलकों में आगे की कार्रवाई पर चर्चा तेज हो गई है।

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