कानपुर का किडनी कांड : 50 हजार के विवाद ने खोला 60 अवैध ऑपरेशनों का काला राज
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कानपुर में उजागर हुए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट ने चिकित्सा जगत को हिलाकर रख दिया है। एक मामूली से 50 हजार रुपये के सौदेबाजी विवाद ने उस गिरोह का पर्दाफाश कर दिया, जो लंबे समय से अस्पतालों की आड़ में इंसानी अंगों का अवैध व्यापार कर रहा था।

कैसे खुला राज? मामले की शुरुआत एक एमबीए छात्र आयुष चौधरी से हुई। आर्थिक तंगी के चलते उसने अपनी किडनी 10 लाख रुपये में बेचने का सौदा किया था। हालांकि, गिरोह ने उसे तय रकम से 50 हजार रुपये कम दिए। इसी धोखाधड़ी से नाराज होकर आयुष ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद छापेमारी में परत-दर-परत गंभीर खुलासे हुए।

60 लाख में बिकती थी एक किडनी जांच में सामने आया कि यह गिरोह अब तक 60 से ज्यादा अवैध किडनी ऑपरेशन कर चुका है। गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद शातिर थी; वे एक किडनी को करीब 60 लाख रुपये में बेचते थे, जिसमें से डोनर को मात्र 10 लाख रुपये मिलते थे। बाकी रकम गिरोह के सदस्यों और अस्पताल के नेटवर्क में बांटी जाती थी।

लखनऊ रेफर हुए डोनर और रिसीवर मामले के खुलासे के बाद डोनर आयुष और रिसीवर पारुल तोमर को कानपुर के हैलट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बेहतर और विशेष इलाज के लिए अब दोनों मरीजों को एम्बुलेंस से लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल (RMLH) भेज दिया गया है। डॉक्टरों के अनुसार, कानपुर में उपचार के दौरान रिसीवर की सेहत में सुधार देखा गया था, जिसे अब लखनऊ की विशेषज्ञ टीम संभाल रही है।

अस्पतालों पर सख्त कार्रवाई स्वास्थ्य विभाग ने इस कांड में लिप्त अस्पतालों के खिलाफ कठोर रुख अपनाया है। आहूजा हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है, जबकि मेड लाइफ हॉस्पिटल को पहले ही सील किया जा चुका है। प्रशासन ने इन अस्पतालों को तीन दिन के भीतर परिसर खाली करने का नोटिस दिया है।

गिरफ्तारी और फरार मास्टरमाइंड पुलिस अब तक 6 डॉक्टरों समेत कुल 7 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है, जिनमें अस्पताल के मालिक डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा और डॉ. प्रीति आहूजा शामिल हैं। इसके अलावा, बाहर से बुलाए गए ओटी टेक्नीशियन कुलदीप सिंह राघव और राजेश कुमार भी पुलिस की गिरफ्त में हैं। हालांकि, इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड अभी भी फरार है और पुलिस उसकी सरगर्मी से तलाश कर रही है।

बड़े नेटवर्क की आशंका यह मामला सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं प्रतीत होता। जांच एजेंसियों को संदेह है कि रैकेट के तार अन्य राज्यों में भी फैले हो सकते हैं। इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे यह साफ होता है कि निजी अस्पतालों में चल रही अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए और अधिक सख्त नियमों की आवश्यकता है।

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