देशभर के प्राइवेट स्कूलों में चल रहा संगठित लूट नेटवर्क अब खुलकर सामने आ गया है। महंगी किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर अभिभावकों की जेब काटी जा रही है। लगातार मिल रही हजारों शिकायतों के बाद अब पूरे देश में इस मुद्दे पर मंथन और एक्शन शुरू हो चुका है। शिक्षा के नाम पर मुनाफे की इस अंधी दौड़ ने शिक्षा व्यवस्था को सेवा के बजाय एक व्यावसायिक मशीन बना दिया है।
इस संगठित लूट को उजागर करने के बाद देशभर से जबरदस्त प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षा विभाग को विशेष टीमें बनाकर प्राइवेट स्कूलों पर छापेमारी के निर्देश दिए हैं। वहीं, मध्य प्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में किताब मेलों का आयोजन करने की घोषणा की है, ताकि अभिभावकों को उचित मूल्य पर किताबें मिल सकें। दिल्ली सरकार ने भी स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि स्कूलों को छात्रों को किसी विशेष वेंडर से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर करने का कोई अधिकार नहीं है।
किताबों के बाद अब बारी है स्कूल यूनिफॉर्म की, जो अभिभावकों के लिए एक बड़ी वित्तीय मुसीबत बन चुकी है। भारत में यूनिफॉर्म मैन्युफैक्चरिंग का कारोबार 72 हजार करोड़ रुपये से अधिक का है। स्कूलों की मनमानी देखिए—वे बच्चों की ड्रेस पर अपने स्कूल का लोगो लगवा देते हैं और किसी एक विशेष दुकान से ही खरीदने का दबाव बनाते हैं। इस कट सिस्टम के पीछे का गणित यह है कि जहां सामान्य बाजार में 100 रुपये में 20-35 रुपये का मुनाफा होता है, वहीं स्कूल-निर्धारित दुकानों पर यह मुनाफा 60 रुपये तक पहुंच जाता है।
लूट के इस तंत्र को डिफेंड करने वाले प्रकाशक अक्सर रोजगार का सहारा लेते हैं। उनका कहना है कि वे हजारों लोगों को काम दे रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजगार देने के नाम पर 5 करोड़ परिवारों को लूटने का लाइसेंस मिल जाता है? सच्चाई यह है कि यह रोजगार का नहीं, बल्कि कमीशन और मुनाफे के उस चोर दरवाजे का खेल है, जिसे स्कूलों ने नियमों में मिली ढील के जरिए तैयार किया है।
सीबीएसई के नियमों के अनुसार, पहली से आठवीं कक्षा तक स्कूलों को एनसीईआरटी (NCERT) की किताबें पढ़ाने की सलाह दी जाती है, और नौवीं से बारहवीं तक तो यह अनिवार्य है। स्कूलों ने सप्लीमेंट्री बुक्स के नाम पर जो चोर दरवाजा बनाया है, उसे पहचानना जरूरी है।
लूट रोकने के लिए आप ये कदम उठा सकते हैं:
समय आ गया है कि सीबीएसई अपने नियमों में संशोधन करे और उस अपवाद को खत्म करे जिसका इस्तेमाल स्कूल लूट के लिए कर रहे हैं। शिक्षा भविष्य का पासपोर्ट है, इसे अमीरों की वस्तु न बनने दें। राज्य सरकारों के अधिकारियों को अपने एसी केबिन से बाहर निकलकर धरातल पर निरीक्षण करने की जरूरत है। अगर अधिकारी सक्रिय हो जाएं, तो देश के करोड़ों परिवारों की मेहनत की कमाई को इस संगठित लूट से बचाया जा सकता है। याद रखें, शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का निर्माण है, न कि उसे धन कमाने की मशीन बनाना।
#DNAमित्रों | स्कूलों की लूट के खिलाफ ZEE NEWS का अभियान, DNA ने Expose किया..देश एक्शन में आया
— Zee News (@ZeeNews) April 2, 2026
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