क्या स्ट्रोक से रिकवरी में जीवनसाथी का साथ वाकई जादू की तरह काम करता है?
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हाल ही में जर्नल ऑफ स्ट्रोक एंड सेरेब्रोवास्कुलर डिजीज में छपी एक रिपोर्ट ने मेडिकल जगत में चर्चा छेड़ दी है। अध्ययन का दावा है कि जिन स्ट्रोक मरीजों की देखभाल उनके जीवनसाथी ने की, उनमें बेटियों या बहुओं द्वारा देखभाल किए गए मरीजों की तुलना में 44% बेहतर रिकवरी देखी गई।

क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि जीवनसाथी बेहतर केयरगिवर होते हैं? न्यूरोलॉजिस्ट इसे सीधे तौर पर मानने से इनकार करते हैं। आइए जानते हैं इस आंकड़े के पीछे की छिपी हुई सच्चाई।

क्या आंकड़ों का खेल है यह?

विशेषज्ञों के अनुसार, इसे जीवनसाथी बनाम बेटी या बहू का मुकाबला समझना गलत होगा। जिन मरीजों की देखभाल उनके जीवनसाथी करते हैं, वे अक्सर उम्र में अपेक्षाकृत छोटे होते हैं और शारीरिक रूप से कम कमजोर होते हैं।

इसके अलावा, ऐसे मामलों में स्ट्रोक की गंभीरता भी कम हो सकती है। इसलिए, रिकवरी का श्रेय केवल कौन देखभाल कर रहा है को देना वैज्ञानिक रूप से अधूरा है।

रिकवरी के लिए 24 घंटे की निरंतरता जरूरी

स्टॉक से रिकवरी केवल उस एक घंटे की फिजियोथेरेपी से नहीं होती, जो अस्पताल में दी जाती है। असली रिकवरी दिन के बाकी 23 घंटों में होती है। मरीज को चलने-फिरने के लिए प्रोत्साहित करना, समय पर दवा देना और दैनिक गतिविधियों में मदद करना—ये सब निरंतरता मांगते हैं।

जीवनसाथी अक्सर मरीज के साथ रहते हैं, इसलिए वे यह निरंतरता बनाए रख पाते हैं। वहीं, बेटियां या बहुएं परिवार की अन्य जिम्मेदारियों या काम के दबाव के कारण शायद उतनी निरंतरता न दे पाएं, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उनकी देखभाल में कमी या भावना का अभाव है।

केयरगिवर का मानसिक स्वास्थ्य: एक अनदेखा पहलू

भारत में एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि देखभाल का पूरा भार अक्सर एक ही व्यक्ति पर आ जाता है। लगातार देखभाल करने वाले जीवनसाथी खुद केयरगिवर बर्नआउट का शिकार हो जाते हैं।

अत्यधिक तनाव, मानसिक थकान और डिप्रेशन का सीधा असर केयरगिवर के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जो अंततः मरीज की रिकवरी की गति को भी प्रभावित कर सकता है।

असली सीख क्या है?

इस अध्ययन का निष्कर्ष यह नहीं है कि देखभाल के लिए कौन सा रिश्ता बेहतर है। असली सीख यह है कि स्ट्रोक का मरीज तब सबसे बेहतर उबरता है, जब उसकी देखभाल करने वाले को भी सपोर्ट मिले।

रिकवरी के लिए निरंतरता, बेहतर तालमेल और भावनात्मक जुड़ाव का होना अनिवार्य है। मरीज की देखभाल परिवार की एक सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, न कि केवल एक व्यक्ति का बोझ, ताकि देखभाल करने वाला भी मानसिक रूप से स्वस्थ रहे और मरीज को बेहतर सहारा मिल सके।

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