राजस्थान दिवस या सियासी रार: स्थापना को लेकर दो तारीखों पर आमने-सामने भाजपा-कांग्रेस
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राजस्थान का स्थापना दिवस इस बार राज्य में जश्न से अधिक राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। प्रदेश के गौरवशाली इतिहास को याद करने के बजाय, सत्ता पक्ष और विपक्ष इस बात पर उलझे हुए हैं कि राजस्थान का स्थापना दिवस आखिर कब मनाया जाना चाहिए।

सरकार का तर्क: कैलेंडर का गणित भजनलाल सरकार ने इस साल राजस्थान दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च) को मनाया। सरकार का तर्क है कि 30 मार्च 1949 को जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने राजस्थान का एकीकरण किया था, उस दिन विक्रम संवत के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही थी। इसी आधार पर सरकार ने भविष्य में इसी तिथि पर राजस्थान दिवस मनाने का निर्णय लिया और 19 मार्च को बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए।

कांग्रेस का स्टैंड: परंपरा की दलील दूसरी ओर, कांग्रेस ने 30 मार्च को ही राजस्थान स्थापना दिवस के रूप में मनाया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, पूर्व सीएम अशोक गहलोत और सचिन पायलट सहित तमाम प्रमुख नेताओं ने सोशल मीडिया के जरिए प्रदेशवासियों को बधाई संदेश दिए। कांग्रेस का कहना है कि 30 मार्च एक स्थापित तिथि है और इसे बदलने से भ्रम की स्थिति पैदा होगी।

विपक्ष ने उठाए व्यावहारिक सवाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार के फैसले पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तारीख हर साल बदलती रहती है। इससे सरकारी दस्तावेजों के छपने में अतिरिक्त खर्च होगा और सबसे अधिक परेशानी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को होगी, जिन्हें हर साल तारीख बदलने के कारण भ्रम का सामना करना पड़ेगा।

बीजेपी का पलटवार भाजपा नेताओं ने कांग्रेस की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस के पास अब कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे ट्विटर पर सियासत कर रहे हैं। भाजपा का मानना है कि नव संवत्सर (भारतीय नव वर्ष) के दिन राजस्थान दिवस मनाना हमारी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने जैसा है, जिसका विरोध करना समझ से परे है।

असमंजस की स्थिति सरकार और विपक्ष के इस टकराव के बीच, प्रदेश की जनता एक बार फिर दो खेमों में बंटी नजर आ रही है। एक तरफ संस्कृति और परंपरा के नाम पर बदली गई तारीख है, तो दूसरी तरफ दशकों से चली आ रही 30 मार्च की स्थापित परंपरा। फिलहाल, यह मुद्दा केवल तारीख का नहीं, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक वर्चस्व का बन गया है।

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