बंगाल का सियासी पारा: ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन, ममता की बढ़ी मुश्किलें
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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने एक साथ चुनाव लड़ने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। इस गठबंधन से राज्य के चुनावी समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं।

टीम बी नहीं, हम टीम एम हैं प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओवैसी ने खुद पर लग रहे आरोपों का तीखा जवाब दिया। जब उनसे एआईएमआईएम को भाजपा की बी टीम कहे जाने पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, हम किसी की बी टीम नहीं हैं। हम मुसलमानों की पूरी टीम हैं, हम टीम एम हैं।

ममता पर ओवैसी का सीधा प्रहार ओवैसी ने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए पुराने घाव कुरेद दिए। उन्होंने सवाल किया कि जब गुजरात जल रहा था, तब ममता बनर्जी किसके साथ बैठकर ढोकला खा रही थीं? ओवैसी के इस तीखे बयान से बंगाल की सियासत गरमा गई है, जिसका सीधा असर ममता के मुस्लिम वोटबैंक पर पड़ सकता है।

हुमायूं कबीर का अटूट वादा हुमायूं कबीर ने इस गठबंधन को भाईचारे का नाम दिया है। उन्होंने कहा कि असदुद्दीन ओवैसी उनके बड़े भाई और अभिभावक की तरह हैं। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक वे जीवित हैं, उनकी पार्टी एआईएमआईएम के साथ मजबूती से खड़ी रहेगी। कबीर ने भविष्य के लोकसभा चुनावों में भी साथ मिलकर लड़ने की घोषणा की है।

क्या ममता बनर्जी का किला ढह जाएगा? राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस गठबंधन से तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुश्किलें बढ़ना तय है। एक ओर भाजपा पहले से ही ममता के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है, वहीं अब ओवैसी-कबीर का गठबंधन मुस्लिम वोटों में सेंधमारी कर सकता है। इससे पड़ने वाला वोटों का बंटवारा सीधे तौर पर भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

सत्ता बचाने की आखिरी लड़ाई? ममता बनर्जी के सामने इस बार चुनौतियों का पहाड़ है। सत्ता विरोधी लहर, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों ने उनकी घेराबंदी कर दी है। जानकार मानते हैं कि 2011 में वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल करने वाली ममता बनर्जी के लिए 2026 की यह लड़ाई अपनी सत्ता को बचाने की सबसे कठिन परीक्षा है।

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