अमेरिका और ईरान के बीच गहराते तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हालिया घटनाक्रम में जेडी वेंस का नाम मुख्य वार्ताकार के तौर पर उभरकर सामने आया है। व्हाइट हाउस अब पुरानी टीम को दरकिनार कर वेंस के जरिए तेहरान के साथ बातचीत की नई राह तलाश रहा है।
जेडी वेंस को वार्ताकार के रूप में चुनना ट्रंप प्रशासन की बदली हुई सोच को दर्शाता है। वेंस पहले भी अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में अमेरिकी हस्तक्षेप के आलोचक रहे हैं। उनका चयन यह संदेश देता है कि वाशिंगटन अब सैन्य दबाव के बजाय कूटनीतिक बातचीत के जरिए आर्थिक नुकसान को कम करना चाहता है। यह बदलाव वॉल्स स्ट्रीट और वैश्विक तेल बाजारों को स्थिर करने की एक कोशिश भी है।
ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघर ग़ालिबफ़ इस वार्ता के केंद्र में हैं। रिवोल्यूशनरी गार्ड के पूर्व जनरल और तेहरान के मेयर रह चुके ग़ालिबफ़ ईरान के सबसे ताकतवर राजनेताओं में से एक हैं। अमेरिका उन्हें एक ठोस पार्टनर के रूप में देख रहा है, जो तेहरान के फैसले प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, ग़ालिबफ़ ने अभी तक अमेरिका की बातचीत की पेशकशों पर संदेह जताया है।
पाकिस्तान ने इस जटिल कूटनीति में खुद को निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दोनों देशों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया है। इस्लामाबाद की यह पहल अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे के उस अंतर को पाटने की कोशिश है, जो सालों से चली आ रही तनातनी के कारण पैदा हुआ है। यदि वार्ता होती है, तो इस्लामाबाद उसका मुख्य मंच बन सकता है।
ईरान ने ट्रंप के उस दावे को सिरे से खारिज किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। तेहरान का रुख स्पष्ट है: अभी तक कोई औपचारिक वार्ता नहीं हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मीडिया में बातचीत की खबरों को उछालकर वैश्विक बाजारों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। ईरान का यह भी कहना है कि अमेरिका पर भरोसा करना मुश्किल है, विशेषकर फरवरी में जिनेवा वार्ता के विफल होने के बाद।
वार्ता की सफलता की पहली शर्त ट्रंप ने तय कर दी है—ईरान को किसी भी हाल में परमाणु हथियार नहीं हासिल करने दिए जाएंगे। अमेरिका का यह सख्त रुख ही बातचीत की सबसे बड़ी बाधा है। फिलहाल वार्ता का स्वरूप पूरी तरह अप्रत्यक्ष है, जिसमें मिस्र, ओमान और तुर्की जैसे देश संदेशवाहक की भूमिका निभा रहे हैं।
जेडी वेंस की एंट्री ने कूटनीतिक उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत काफी पेचीदा है। ईरान की तरफ से अमेरिका के पूर्व दूतों (कुशनर और विटकॉफ) पर विश्वासघात का आरोप लगाना स्थिति को और जटिल बनाता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वेंस, तेहरान के अविश्वास को दूर कर पाएंगे या फिर यह कोशिश भी केवल एक राजनीतिक दिखावा बनकर रह जाएगी?
.@POTUS on Iran: We re in negotiations right now... I can tell you, they d like to make a deal — and who wouldn t if you were there? Look, their navy s gone, their air force is gone, their communications are gone... pretty much everything they have is gone. pic.twitter.com/PlEpYkGbyA
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) March 24, 2026
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