ईरान संकट के बीच भारत की साइलेंट तैयारी: दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा LPG रिजर्व बना सुरक्षा कवच
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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान जैसे संकटों के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को एक बड़ा कवच मिल गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने मंगलौर में दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत एलपीजी (LPG) स्ट्रेटजिक रिजर्व का निर्माण पूरा कर लिया है। यह सुविधा पिछले 6 महीनों से पूरी तरह ऑपरेशनल है।

क्या है मंगलौर एलपीजी कैवर्न की खासियत? कर्नाटक के मंगलौर में स्थित यह अंडरग्राउंड कैवर्न 80,000 मीट्रिक टन एलपीजी स्टोर करने की क्षमता रखती है। यह लगभग 6 लाख बैरल ईंधन के बराबर है। समुद्र तल से 156 मीटर नीचे चट्टानों को काटकर बनाई गई यह सुविधा अंडरग्राउंड रॉक कैवर्न टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जो इसे प्राकृतिक आपदाओं और बाहरी हमलों से सुरक्षित रखती है।

चुपचाप तैयार की गई ऊर्जा सुरक्षा सरकार ने इस प्रोजेक्ट को बहुत ही गोपनीयता के साथ पूरा किया। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने सोशल मीडिया के माध्यम से इसके बारे में जानकारी दी थी, लेकिन इसे बड़े शोर-शराबे से दूर रखा गया। पीएम मोदी ने हाल ही में लोकसभा में बताया कि भारत अपनी जरूरत का 60% एलपीजी आयात करता है। ऐसे में यह रिजर्व संकट के समय देश में घरेलू सप्लाई को निर्बाध बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।

इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना इंजीनियरिंग इंडिया लिमिटेड (EIL) द्वारा तैयार इस प्रोजेक्ट में सुरक्षा के लिए वॉटर कर्टेन टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया है, जिससे गैस रिसाव का खतरा लगभग शून्य हो जाता है। यह परियोजना न केवल आत्मनिर्भर भारत के विजन को दर्शाती है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

वैश्विक संकट में भारत की रणनीति मौजूदा समय में जब हॉर्मूज संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन को लेकर अनिश्चितता है, मंगलौर पोर्ट पर अमेरिका और रूस के टैंकरों का एक साथ पहुंचना भारत की कूटनीतिक और ऊर्जा शक्ति का प्रतीक है। रूस से क्रूड ऑयल और अमेरिका से एलपीजी की आपूर्ति इसी स्टोरेज क्षमता के कारण निर्बाध रूप से जारी है।

2030 का बड़ा लक्ष्य मंगलौर के अलावा, विशाखापट्टनम और पाडुर में भी भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं। सरकार ओडिशा के चंडीखोल में भी बड़े पैमाने पर भंडारण क्षमता विकसित कर रही है। भारत का लक्ष्य 2030 तक 90 दिनों का ऊर्जा रिजर्व तैयार करना है ताकि किसी भी वैश्विक भू-राजनीतिक संकट का असर आम भारतीय के रसोई गैस या परिवहन खर्च पर न पड़े।

यह परियोजना मात्र एक ढांचागत निर्माण नहीं, बल्कि एक भविष्यवादी दृष्टिकोण है, जिसने भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अधिक आत्मविश्वास और सुरक्षित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है।

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