क्या विरोध का अधिकार आजीविका से बड़ा है? CAIT का राहुल गांधी से तीखा सवाल
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कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को एक कड़ा पत्र लिखकर राजनीतिक रैलियों और विरोध प्रदर्शनों से ठप हो रहे व्यापार पर सवाल खड़े किए हैं। व्यापारियों का कहना है कि प्रदर्शनों के नाम पर आम आदमी की रोजी-रोटी को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

व्यापार के अधिकार का हनन CAIT ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि वे अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान करते हैं, लेकिन यह किसी को भी व्यावसायिक गतिविधियों में बाधा डालने का लाइसेंस नहीं देता। संगठन ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को व्यापार करने का मौलिक अधिकार है, जिसे बार-बार हो रहे विरोध प्रदर्शनों की आड़ में नजरअंदाज किया जा रहा है।

त्योहारी सीजन में करोड़ों का नुकसान पत्र में चिंता जताई गई है कि पिछले एक महीने में दिल्ली में हुई रैलियों और प्रदर्शनों के कारण व्यापारिक समुदाय को भारी आर्थिक चपत लगी है। त्योहारी सीजन के दौरान हुई इन गतिविधियों ने न केवल दुकानदारों को नुकसान पहुंचाया, बल्कि ग्राहकों और व्यावसायिक आगंतुकों के लिए भी भारी मुसीबतें पैदा कीं।

राहुल गांधी से मांगे 5 तीखे जवाब CAIT ने राहुल गांधी से पांच प्रमुख सवाल पूछे हैं:

  1. क्या विरोध का अधिकार व्यापार करने के अधिकार से ऊपर है? राजनीतिक लड़ाई की कीमत व्यापारी क्यों चुकाएं?
  2. राजधानी के व्यावसायिक जीवन को प्रभावित करना क्या नैतिक रूप से सही है? इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
  3. एक तरफ बाजारों से खरीदारी की अपील और दूसरी तरफ प्रदर्शन से ग्राहकों को रोकना—क्या यह विरोधाभास नहीं है?
  4. क्या कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी लेंगे, या आम नागरिक की आजीविका उनके लिए महज कोलेटरल डैमेज है?
  5. यदि उन्हें खुद अपने काम में ऐसी बाधा झेलनी पड़े, तो क्या वे इसे स्वीकार करेंगे?

क्या मुआवजे की मिलेगी भरपाई? यह पहली बार नहीं है जब व्यापारियों ने रैलियों के कारण होने वाले नुकसान पर आवाज उठाई है। 1 नवंबर को रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की महारैली के बाद चेंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्रीज (CTI) ने भी 11,000 करोड़ रुपये के व्यावसायिक नुकसान का दावा करते हुए मुआवजे की मांग उठाई थी। फिलहाल, राहुल गांधी या कांग्रेस की ओर से इस पत्र पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन व्यापारियों का बढ़ता आक्रोश राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

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