क्या भारत विरोधी बयानबाजी और टूटे वादों ने ट्रंप की पार्टी को चुनाव में हराया?
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अमेरिकी मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) के नतीजों ने राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। इन चुनावों में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भूमिका और उनके बदलते रुख ने विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। चर्चा है कि क्या रिपब्लिकन पार्टी की भारत-विरोधी बयानबाजी और ट्रम्प की नीतियां उनकी हार का कारण बनीं?

बढ़ता राजनीतिक प्रभाव

ओआरएफ अमेरिका के कार्यकारी डायरेक्टर ध्रुव जयशंकर का कहना है कि भारतीय-अमेरिकी भले ही संख्या में कम (कुल मतदाताओं का 1 से 1.5 फीसदी) हों, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा है। उन्होंने बताया कि इस चुनाव में इस समुदाय ने डेमोक्रेट्स को प्राथमिकता दी है, जिससे रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है। विशेष रूप से टेक्सास जैसे राज्यों में भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर स्पष्ट दिखा।

10 प्रतिशत का बड़ा स्विंग

जयशंकर के अनुसार, भारतीय-अमेरिकी वोटर्स के व्यवहार में इस बार बड़ा बदलाव आया है। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन समर्थकों के बीच 30 प्रतिशत का अंतर था, जो इस बार बढ़कर 45 से 50 प्रतिशत तक पहुंच गया। यानी, करीब 10 प्रतिशत मतदाताओं ने अपना पाला बदला है, जो नतीजों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त था।

ट्रम्प के वादे और भारतीयों का मोहभंग

अमेरिकी कांग्रेस मैन थानेदार का मानना है कि रिपब्लिकन पार्टी को भारतीय-अमेरिकी समुदाय का समर्थन खोना पड़ा, क्योंकि उनके वादे अधूरे रहे। थानेदार के मुताबिक, शुरुआत में कई भारतीयों ने आर्थिक लाभ की उम्मीद में ट्रम्प का समर्थन किया था, लेकिन बढ़ती महंगाई और आर्थिक तंगी ने उन्हें निराश किया।

व्यापार और इमीग्रेशन का असर

विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रम्प द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए भारी टैरिफ ने दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को नुकसान पहुंचाया। इसके अलावा, एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड प्रोसेसिंग में भारी देरी ने भारतीय-अमेरिकियों के बीच गहरी नाराजगी पैदा की। थानेदार ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस में दिखी ब्लू वेव (डेमोक्रेट्स की जीत) केवल उनकी नीतियों का समर्थन नहीं, बल्कि ट्रम्प के आक्रामक कदमों के खिलाफ फैला व्यापक असंतोष था।

निष्कर्षतः, भारतीय-अमेरिकी समुदाय अब अपनी प्राथमिकताओं को लेकर अधिक सतर्क हो गया है। आर्थिक स्थिरता, इमीग्रेशन सुधार और द्विपक्षीय संबंधों में स्पष्टता अब उनके वोटिंग पैटर्न को तय करने वाले मुख्य कारक बन गए हैं।

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