पहले लिफाफा खुला, फिर डील हुई: IDBI बैंक-फेयरफैक्स के ₹53,000 करोड़ के सौदे पर क्यों उठ रहे सवाल?
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IDBI बैंक का निजीकरण देश के सबसे बड़े विनिवेश सौदों में से एक माना जा रहा है। सरकार ने अपनी 60.72% हिस्सेदारी कनाडाई कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल को ₹52,878 करोड़ में बेचने को मंजूरी दी है। हालांकि, मंजूरी मिलते ही यह डील विवादों के घेरे में आ गई है।

क्या नीलामी प्रक्रिया में हुई धांधली?

विवाद की जड़ एक मीडिया रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया है कि सौदे की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार, 13 जुलाई 2026 को सीलबंद लिफाफा खोलकर फेयरफैक्स की बोली देखी गई, और उसके बाद ही बैंक के वैल्यूएशन और नियमों में बदलाव कर दिए गए। आरोप है कि शुरुआती बोली कम रहने के बावजूद नियमों को खरीदार के अनुकूल ढाल दिया गया।

रिजर्व प्राइस का गणित और संशय

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पहले राउंड में रिजर्व प्राइस ₹94.42 प्रति शेयर था। जब फेयरफैक्स ने ₹81 प्रति शेयर की बोली लगाई, तो सरकार ने अंतिम बेंचमार्क कीमत घटाकर ₹75.99 कर दी। इस कदम ने विशेषज्ञों और विपक्ष को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह फेयरफैक्स को लाभ पहुंचाने के लिए जानबूझकर किया गया बदलाव था।

राहुल गांधी का हमला: मोदी सरकार बैंक बेच रही है

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस डील को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि कांग्रेस के समय देश के औद्योगिक विकास के लिए बैंक बनाए गए थे, लेकिन मौजूदा सरकार उन्हें बेच रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले बोली देखी गई और फिर अपनी सुविधा के अनुसार दाम तय किए गए।

सरकार और वित्त मंत्रालय का बचाव

विवाद बढ़ने पर वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि प्रक्रिया में कोई धांधली नहीं हुई है। सरकार का तर्क है कि पहला राउंड विफल रहने के बाद दूसरे राउंड की बिडिंग पूरी तरह पेशेवर और कानूनी दायरे में हुई। मंत्रालय के अनुसार, वैल्यूएशन के लिए दो स्वतंत्र सलाहकारों की मदद ली गई थी और मार्केट मल्टीपल मेथड का उपयोग किया गया था।

निर्मला सीतारमण का पलटवार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जब NDA सरकार आई थी, तब IDBI बैंक की स्थिति बेहद खराब थी और इसे विलफुल डिफॉल्टर्स (जैसे किंगफिशर, एबीजी शिपयार्ड) को कर्ज देने के लिए मजबूर किया गया था। वित्त मंत्री ने जोर दिया कि बैंक की वित्तीय स्थिति सुधारने के बाद ही इसे विकास के लिए निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।

यह डील फिलहाल देश के बैंकिंग जगत और राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी चर्चा का विषय बनी हुई है। जहां एक ओर सरकार इसे एक सफल विनिवेश मान रही है, वहीं दूसरी ओर प्रक्रिया में अपनाई गई गोपनीयता पर उठ रहे सवाल सरकारी दावों की विश्वसनीयता पर असर डाल रहे हैं।

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