MLC चुनाव 2024: 4 राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ , NDA का जोरदार दबदबा
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देश के चार प्रमुख राज्यों—कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार—में हुई 28 विधान परिषद (MLC) सीटों की मतगणना ने कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इन चुनावों में पार्टी एक भी सीट जीतने में नाकाम रही, जिससे उसके संगठनात्मक ढांचे पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

कर्नाटक में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका कांग्रेस के लिए सबसे हैरान करने वाले नतीजे कर्नाटक से आए, जहाँ उनकी खुद की पूर्ण बहुमत की सरकार है। राज्य की सभी चार सीटों पर बीजेपी और जेडीएस गठबंधन ने कब्जा जमा लिया। यहाँ पार्टी न केवल अपनी मौजूदा सीट गंवा बैठी, बल्कि एक भी सीट बचाने में विफल रही।

खरगे के गढ़ में बीजेपी की दहाड़ बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में बड़ा उलटफेर हुआ, जहां जेडीएस के एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के सिटिंग एमएलसी पुत्तन्ना को हराया। वहीं, नॉर्थ-ईस्ट टीचर्स सीट पर बीजेपी के शशि जी. नमोशी की जीत अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह क्षेत्र कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का गृह इलाका है। मंत्रियों के भारी प्रचार के बावजूद, स्नातक और शिक्षक वर्ग का झुकाव एनडीए की ओर ही रहा।

यूपी और बिहार का सियासी गणित उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच कांटे की टक्कर रही। बीजेपी ने लखनऊ और मेरठ जैसी सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत रखी, जबकि सपा ने वाराणसी और आगरा में जीत दर्ज की। बिहार में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने अपना खाता खोलकर सबको चौंका दिया है। जन सुराज के प्रत्याशी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और एमएलसी मदन मोहन झा को शिकस्त दी।

महाराष्ट्र में महायुति का पलड़ा भारी महाराष्ट्र की पांच विधान परिषद सीटों पर सत्तारूढ़ महायुति और महा विकास अघाड़ी (MVA) के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला। रुझानों के अनुसार, महायुति गठबंधन को स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है, जो राज्य की राजनीति में उनकी निरंतर पकड़ को दर्शाता है।

राजनीतिक मायने: क्या है संदेश? MLC चुनाव में शिक्षक और स्नातक ही मतदान करते हैं, जो समाज के पढ़े-लिखे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन नतीजों को केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल की नीतियों पर जनता की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस का शून्य पर सिमटना यह दर्शाता है कि पार्टी न केवल अपनी वैचारिक अपील खो रही है, बल्कि जमीनी स्तर पर उसकी पकड़ भी कमजोर हो रही है। कर्नाटक की हार विशेष रूप से राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

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