काहिरा: यमन संकट और बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच मिस्र की संसद ने राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी को सऊदी अरब के पक्ष में सैन्य कदम उठाने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस फैसले को मध्य-पूर्व की बदलती सुरक्षा स्थिति के लिए एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
हमला नहीं, रक्षा ही प्राथमिकता राष्ट्रपति सिसी ने संसद के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि मिस्र को अपने खाड़ी सहयोगी सऊदी अरब को सुरक्षा के लिए सैन्य समर्थन देना चाहिए। इस पहल की सबसे बड़ी शर्त यह है कि मिस्र की सेना केवल सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की रक्षा में मदद करेगी। यमन या किसी अन्य देश पर सीधे हमला करना इस मिशन का हिस्सा नहीं है।
ईरान-हूती संघर्ष में नया मोड़ ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बाद सऊदी अरब अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क है। अब तक मिस्र ने ईरान और उसके समर्थित हमलों की निंदा तो की है, लेकिन सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने से बचता रहा है। संसद की इस मंजूरी के बाद मिस्र का इस संघर्ष में सीधा हस्तक्षेप बढ़ने की संभावना है।
रणनीतिक और आर्थिक गठबंधन मिस्र और सऊदी अरब के बीच संबंध काफी गहरे हैं। सऊदी अरब मिस्र का प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। सिसी के शासनकाल में रियाद ने काहिरा को अरबों डॉलर की आर्थिक सहायता दी है। ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए सऊदी अरब की हर संभव मदद करने के लिए मिस्र पूरी तरह तैयार दिख रहा है।
क्या क्षेत्रीय तनाव और बढ़ेगा? संसद में इस प्रस्ताव को बहुमत से हरी झंडी मिलने के बाद मध्य-पूर्व में चल रहा ईरान, यमन और सऊदी अरब के बीच का तनाव और व्यापक हो सकता है। जानकारों का कहना है कि मिस्र का यह कदम न केवल खाड़ी देशों की सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन को भी प्रभावित करेगा। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मिस्र इस सैन्य अधिकार का उपयोग कब और कैसे करता है।
🇪🇬🇸🇦 Middle East Security Watch: Egypt’s parliament has approved a request authorising military support for Saudi Arabia, signalling closer Cairo–Riyadh defence coordination amid rising regional tensions.#Iran #saudiarabia pic.twitter.com/0OZSO8jqwW
— Tapas Ranjan Nath (@nathtapas) October 26, 2026
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