संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में चल रहे सुधारों की कवायद के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी बेबाक राय रखी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतानेनी हरीश ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा परिषद में संरचनात्मक बदलावों के लिए अब समय-सीमा तय कर टेक्स्ट-आधारित वार्ता शुरू करना अनिवार्य हो गया है।
डी-फैक्टो वीटो और मनमानी पर प्रहार राजदूत हरीश ने केवल औपचारिक वीटो (Veto) को ही समस्या नहीं माना, बल्कि पर्दे के पीछे चलने वाली राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने डी-फैक्टो वीटो की गंभीर समस्या का जिक्र करते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद के सदस्य अनौपचारिक तौर पर सर्वसम्मति के नाम पर किसी भी प्रस्ताव को बिना कारण बताए रोक देते हैं। यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय फैसलों में बाधा डालती है।
नए और पुराने सदस्यों के बीच भेदभाव अस्वीकार्य भारत ने कॉमन अफ्रीकन पोजिशन का समर्थन करते हुए साफ किया कि यदि सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्य शामिल किए जाते हैं, तो उन्हें पुराने सदस्यों के बराबर ही वीटो का अधिकार मिलना चाहिए। भारत का तर्क है कि अलग शर्तों के साथ नई श्रेणी के स्थायी सदस्य बनाना पुरानी असमानता को ही और अधिक गहरा करेगा।
वीटो का राजनीतिक इस्तेमाल बंद हो संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए राजदूत ने बताया कि अब तक 331 बार वीटो का इस्तेमाल किया जा चुका है। उन्होंने चिंता जताई कि वीटो का उपयोग अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए किया जा रहा है।
भारत की मुख्य मांगें:
भारत का यह रुख स्पष्ट करता है कि सुरक्षा परिषद को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाए बिना वैश्विक समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
#WATCH | Permanent Representative of India to the UN in New York, Ambassador Parvathaneni Harish says, ...India reiterates its call for a comprehensive approach towards Security Council reforms. The starting point is early commencement of text-based negotiations with clearly… pic.twitter.com/KWDIxPeKoB
— ANI (@ANI) October 27, 2026
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