विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हालिया बाकू यात्रा ने भारत-अजरबैजान संबंधों पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। आमतौर पर नई दिल्ली में अजरबैजान को केवल तुर्की और पाकिस्तान की धुरी का एक हिस्सा माना जाता है। लेकिन क्या वास्तव में बाकू की विदेश नीति को इन्हीं दो देशों के चश्मे से देखना भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक गलती है? गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अजरबैजान का भू-राजनीतिक गणित कहीं अधिक जटिल है।
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद अजरबैजान ने पाकिस्तान के प्रति एकजुटता दिखाते हुए भारत की सैन्य कार्रवाई की निंदा की थी। तुर्की, चीन और अजरबैजान का यह रुख नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक झटका था। राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव के पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध और भारत विरोधी बयानों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया। हालांकि, इसे केवल एकतरफा झुकाव मानना भूल होगी।
बाकू की विदेश नीति केवल इस्लामिक एकजुटता तक सीमित नहीं है। तुर्की के साथ एक राष्ट्र, दो राज्य की भावना और पाकिस्तान के साथ राजनीतिक गठबंधन अपनी जगह है, लेकिन अजरबैजान की असली प्राथमिकताएं उसकी संप्रभुता, कैस्पियन ऊर्जा संसाधन, नाख्चिवान गलियारे की सुरक्षा और रूस-ईरान के बीच संतुलन बनाने में निहित हैं। बाकू की नीतियां उसकी आर्थिक जरूरतों और क्षेत्रीय सुरक्षा से तय होती हैं, न कि केवल तुर्की या पाकिस्तान के इशारों पर।
अजरबैजान को केवल इस्लामिक देश के चश्मे से देखना इसकी सबसे बड़ी अनदेखी है। 1992 से ही इजरायल और अजरबैजान के बीच गहरे रक्षा और खुफिया संबंध रहे हैं। बाकू ने इजरायल से लगभग 4.85 अरब डॉलर के हथियार खरीदे हैं, जिसने 2020 के युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई। भारत के भी इजरायल के साथ प्रगाढ़ संबंध हैं। यानी, बाकू और नई दिल्ली के बीच एक अप्रत्यक्ष सेतु पहले से मौजूद है, जिसे भारत ने अब तक पूरी तरह भुनाया नहीं है।
भारत के लिए काकेशस क्षेत्र में आर्मेनिया एक महत्वपूर्ण साझेदार है, जिसे भारत पिनाका जैसे हथियार दे रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल सौदे की चर्चा ने बाकू में चिंता पैदा कर दी है। यहां भारत के सामने चुनौती है कि वह आर्मेनिया से संबंध भी रखे और अजरबैजान को यह संदेश भी दे कि भारत उसकी क्षेत्रीय संप्रभुता के खिलाफ नहीं है। भारत को आर्मेनिया और अजरबैजान के प्रति अपनी नीतियों को अलग रखने के बजाय एक समग्र काकेशस रणनीति अपनानी होगी।
सोवियत संघ के पतन के बाद से किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने अजरबैजान का दौरा नहीं किया था, जो भारत की कूटनीतिक सुस्ती को दर्शाता है। COP29 के लिए प्रधानमंत्री मोदी की बाकू यात्रा ने इस कमी को दूर करने की एक शुरुआत की है। भारत ने दशकों तक ONGC के निवेश जैसे आर्थिक पहलुओं पर तो ध्यान दिया, लेकिन राजनीतिक पूंजी निवेश करने में देरी की, जिसका फायदा चीन और अन्य देशों ने उठाया।
अजरबैजान एक ऊर्जा-समृद्ध देश है और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के लिए भारत की मुख्य कड़ी है। यदि भारत बाकू को केवल बहिष्कार की नीति से देखेगा, तो वह उसे अनचाहे ही पाकिस्तान की ओर और अधिक धकेल देगा। भारत को अब आक्रामकता के बजाय संतुलन की कूटनीति अपनानी चाहिए।
निष्कर्ष यह है कि अजरबैजान को केवल किसी धुरी का हिस्सा मानकर खारिज कर देना भारत की रणनीतिक दूरदर्शिता के लिए हानिकारक है। एक स्वतंत्र, ऊर्जा-सक्षम और यूरेशियाई प्रभाव वाले देश के रूप में बाकू के साथ संवाद ही भारत को उसके वैश्विक हितों की रक्षा करने में मदद करेगा।
Paid a visit to the historic Ateshgah fire temple in Baku.
— Dr. S. Jaishankar (@DrSJaishankar) October 23, 2026
A symbol of the historical and cultural connect between our two peoples.
🇮🇳 🇦🇿 pic.twitter.com/pMurkrMVGQ
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