लद्दाख का गोल्ड : 14,000 फीट की ऊंचाई पर उगने वाला यह सुपरफूड क्यों बना चर्चा का विषय?
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लद्दाख की बंजर और ठंडी वादियों से निकलकर एक छोटी सी नारंगी बेरी ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इसे सी-बकथॉर्न (Seabuckthorn) कहा जाता है, जिसे हाल ही में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने लद्दाख का सोना करार दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद से ही इस फल की मांग तेजी से बढ़ रही है।

क्या है सी-बकथॉर्न की खासियत?

सी-बकथॉर्न का पौधा 4,000 से 14,000 फीट की ऊंचाई पर रेतीली मिट्टी में प्राकृतिक रूप से उगता है। यह पौधा अत्यंत विपरीत परिस्थितियों, जैसे कि भीषण ठंड और कम बारिश में भी जीवित रहता है। इसकी जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं, जिससे भू-कटाव रुकता है। भारत में इसकी 70 प्रतिशत से अधिक पैदावार लद्दाख में होती है।

क्यों कहा जाता है इसे सुपरफूड ?

इस बेरी को पोषण का पावरहाउस माना जाता है। इसमें नींबू से कहीं अधिक विटामिन-सी पाया जाता है। इसके अलावा, इसमें विटामिन-ई, बी-कॉम्प्लेक्स और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं। इसके बीज और गूदे से निकलने वाला तेल ओमेगा-3, 6, 7 और 9 का बेहतरीन स्रोत है। ओमेगा-7 की अधिक मात्रा ही इसे वैश्विक बाजार में खास बनाती है।

GI टैग से मिली नई पहचान

हाल ही में लद्दाख सी-बकथॉर्न को GI (भौगोलिक संकेतक) टैग मिला है। इससे इस उत्पाद की शुद्धता और पहचान सुरक्षित हो गई है। GI टैग मिलने से अब बाजार में इसके नाम का गलत इस्तेमाल नहीं हो पाएगा और स्थानीय किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिलने की राह आसान हो गई है।

खेती और प्रोसेसिंग की चुनौतियां

लद्दाख में हर साल करीब 600 टन सी-बकथॉर्न की तुड़ाई होती है। इसकी खेती पूरी तरह से जैविक है। हालांकि, इसकी झाड़ियों में कांटे होने के कारण बेरी तोड़ना एक बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है। इस समस्या को देखते हुए DRDO की संस्था DIHAR ने विशेष हार्वेस्टर विकसित किए हैं जो बिजली से चलते हैं।

कहां होती है इसकी खपत?

सी-बकथॉर्न का उपयोग जूस, जैम, चाय, दवाओं और कॉस्मेटिक्स बनाने में हो रहा है। इसके तेल की मांग सबसे अधिक है; बाजार में फल का तेल 20,000-22,000 रुपये प्रति लीटर और बीज का तेल 28,000 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है।

प्रारंभिक प्रोसेसिंग लद्दाख में होती है, जबकि गूदा और अन्य कच्चे माल बड़ी FMCG और हर्बल कंपनियों को भेजे जाते हैं। इसके उत्पादों का निर्यात विदेशों में भी किया जा रहा है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरा है।

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