RSS पर राहुल गांधी के वार के बाद भड़कीं प्रियंका चतुर्वेदी, राजनीतिक दलों पर साधा बड़ा निशाना
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नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा आरएसएस (RSS) को लेकर दिए गए विवादास्पद बयान के बाद राजनीति गरमा गई है। अब इस मामले पर शिवसेना (UBT) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने राहुल गांधी के आरोपों के बीच देश की राजनीतिक पार्टियों के दोहरे चरित्र पर कड़ा प्रहार किया है।

राहुल गांधी ने RSS पर क्या आरोप लगाए? राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में आरएसएस को महिलाओं के प्रति पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण सोच रखने वाला संगठन करार दिया। उन्होंने दावा किया कि संघ का मानना है कि महिलाएं पुरुषों की संपत्ति हैं। राहुल ने कहा कि वे इस विचारधारा से लड़ रहे हैं और उन्हें खुशी है कि संघ से जुड़ी कई महिलाएं आज उनके साथ खड़ी हैं।

राजनीतिक एजेंडे से ऊपर उठें दल इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि देश में आज हर मुद्दे का राजनीतिकरण हो गया है। उन्होंने कहा, आज आपकी आजादी बनाम मेरी आजादी और आपका सशक्तिकरण बनाम मेरा सशक्तिकरण जैसी बहस छिड़ गई है। आज भी देश में एक गहरी पितृसत्तात्मक सोच मौजूद है, जिससे ऊपर उठने की जरूरत है।

दलों के अंदर का सच: खुद के घर में झांकें नेता शिवसेना नेता ने सभी राजनीतिक दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि जो पार्टियां सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं के हक और सम्मान की बात करती हैं, वे पहले अपने आंतरिक ढांचे को देखें। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ये दल अपनी पार्टी के भीतर महिलाओं को समान पद और निर्णय लेने की शक्ति (Power) देते हैं?

दोहरे मापदंड पर प्रहार प्रियंका ने बृजभूषण शरण सिंह और मणिपुर के मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाएं केवल राजनीतिक मोहरा बनकर रह गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल महिलाओं की गरिमा के नाम पर सिलेक्टिव रुख अपनाते हैं। उन्होंने महिला आरक्षण बिल को 2029 तक लटकाने पर भी दुख जताया और कहा कि संसद में महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत आज भी चिंताजनक है।

क्या है निष्कर्ष? प्रियंका चतुर्वेदी का यह बयान स्पष्ट करता है कि वे केवल आरएसएस पर राहुल गांधी के आरोपों के साथ नहीं खड़ी हैं, बल्कि उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति करने वाले हर दल के दोहरेपन को आईना दिखाया है। उनका मानना है कि जब तक राजनीतिक दल अपने भीतर महिलाओं को वास्तविक भागीदारी नहीं देंगे, तब तक उनकी बातें केवल शब्द बनकर रह जाएंगी।

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