देश की राजधानी दिल्ली इन दिनों अराजकता और सुनियोजित प्रदर्शनों का केंद्र बन गई है। सड़कों पर हर दिन नए ऐलान हो रहे हैं, कभी तिरंगे के नाम पर तो कभी किसी और बहाने से। लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे छिपे इरादे अब संदेह के घेरे में हैं। क्या यह महज एक लोकतांत्रिक विरोध है या भारत को अस्थिर करने की कोई गहरी साजिश?
प्रोटेस्ट की तस्वीरों में नेहा बोरा का चेहरा सबसे आगे दिख रहा है, जिनके कंधे पर राहुल गांधी का हाथ नजर आना कोई इत्तेफाक नहीं लगता। खुलेआम बांग्लादेश मॉडल और रिजीम चेंज की बातें ये साबित कर रही हैं कि इस इकोसिस्टम का मकसद चुनावी हार का बदला लोकतांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि अराजकता फैलाकर लेने का है। प्रशांत भूषण जैसे लोगों का प्रेस कॉन्फ्रेंस में तख्तापलट और सत्ता परिवर्तन का जिक्र करना इसी खतरनाक मंशा को दर्शाता है।
जो लोग बाहर जेम्स बॉन्ड बनकर पुलिस को चुनौती दे रहे थे, वे अब तिहाड़ जेल के भीतर अपनी असलियत देख रहे हैं। सौरभ दास और आशुतोष रांका जैसे प्रदर्शनकारी, जो कभी वीआईपी ट्रीटमेंट की उम्मीद में थे, अब जेल में आम कैदियों की तरह दाल-रोटी खा रहे हैं और जमीन पर सो रहे हैं। जेल के भीतर अन्य कैदियों की नाराजगी और सुरक्षा के बीच इनकी अकड़ अब पूरी तरह ढीली पड़ती नजर आ रही है।
तिहाड़ में बंद साथियों के बाद अब अभिजीत दीपके और रत्ना सिंह की मुश्किलें भी गहराने वाली हैं। एसीपी विवेक भगत की शिकायत पर दर्ज एफआईआर में इन सभी पर एससी-एसटी एक्ट जैसी संगीन धाराएं लगाई गई हैं। अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो इनके लिए कानूनी राहत पाना बेहद मुश्किल होगा। वहीं, मुंबई में विदेशी नागरिक होने के बावजूद इमरान खान का प्रदर्शन में शामिल होना और अब उनके खिलाफ इमिग्रेशन एक्ट के तहत कार्रवाई होना यह साफ करता है कि कानून अब किसी को नहीं बख्शेगा।
राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के 11 नेताओं के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख निराशाजनक रहा है। जिस तरह राहुल गांधी भारी भीड़ के साथ कोर्ट परिसर में घुसे और माहौल बनाने की कोशिश की, उस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि न्यायपालिका को डराया-धमकाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने अब राहुल गांधी, खड़गे और अन्य नेताओं को नोटिस जारी कर सफाई मांगी है। साथ ही, उस दिन की सीसीटीवी फुटेज को भी सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं।
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि 10 अक्टूबर को इंटरनेट बंद करने और पाबंदियां लगाने का फैसला महज एहतियात था, ताकि राजधानी में किसी भी तरह की हिंसा न भड़के। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दो टूक कहा कि पुलिस ने कोई माफी नहीं मांगी है, बल्कि यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया थी। उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता और रील बनाने वाले उपद्रवियों के बीच के बारीक अंतर को भी कोर्ट के सामने मजबूती से रखा।
कुल मिलाकर, मोदी विरोधी इकोसिस्टम का हर दांव अब उन्हीं पर भारी पड़ रहा है। चाहे सड़क हो या अदालत, इनकी हर साजिश का पर्दाफाश होता जा रहा है। अब देखना यह है कि कानून के शिकंजे में फंसे इन लोगों का अगला कदम क्या होता है।
Desh Ki Pathshala : अदालत ने राहुल गांधी को झटका दिया.. कोर्ट में सरकार के माफी मांगने का सच क्या? | Sushant Sinha#DeshKiPathshala #News18IndiaDeshKiPathshala | @SushantBSinha pic.twitter.com/ZyguGZxXqD
— News18 India (@News18India) October 15, 2026
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