IAS की कुर्सी छोड़ राजनीति के अखाड़े में दिव्या मित्तल: मिर्जापुर सदर सीट ही क्यों बनी उनका पहला निशाना?
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय तब शुरू हुआ जब पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर सीधे चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया। उन्होंने अपनी नई पार्टी जनता शक्ति पार्टी का गठन किया है और मिर्जापुर सदर सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की है। उनके इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

मिर्जापुर का सियासी महत्व विंध्य पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा मिर्जापुर केवल मां विंध्यवासिनी धाम के लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में अपनी धमक के लिए भी जाना जाता है। कमलापति त्रिपाठी से लेकर फूलन देवी और अनुप्रिया पटेल तक, जिले ने कई कद्दावर नेता दिए हैं। जिले की पांच विधानसभा सीटों में मिर्जापुर सदर सीट जिला मुख्यालय होने के कारण सबसे अहम मानी जाती है।

क्या कहता है मिर्जापुर का इतिहास? इस सीट पर किसी एक पार्टी का एकाधिकार नहीं रहा है। 2002 से 2012 तक समाजवादी पार्टी के कैलाश नाथ चौरसिया का दबदबा था, लेकिन 2017 और 2022 के चुनावों में भाजपा के रत्नाकर मिश्र ने यहां कमल खिलाया। यह उतार-चढ़ाव साबित करता है कि यहां का मतदाता बदलाव का स्वागत करता है, जो दिव्या मित्तल के लिए एक बड़ी उम्मीद की किरण है।

चुनौतियां: दिग्गजों का सामना दिव्या मित्तल के सामने सबसे बड़ी चुनौती BJP और SP जैसे स्थापित दलों के मजबूत नेटवर्क से निपटना है। रत्नाकर मिश्र का दो बार का अनुभव और कैलाश नाथ चौरसिया का जमीनी आधार, दोनों ही उनके लिए बड़ी बाधाएं हो सकते हैं। प्रशासनिक बैकग्राउंड होने के नाते उन्हें कामकाजी नेता के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन राजनीति में बूथ-स्तर का संगठन और कार्यकर्ताओं का नेटवर्क जीत के लिए अनिवार्य है।

जातीय समीकरण और वैश्य वोट बैंक मिर्जापुर सदर में वैश्य मतदाताओं की संख्या डेढ़ लाख से अधिक होने का दावा किया जाता है। दिव्या मित्तल की उम्मीदवारी के साथ ही इसे उनका मुख्य आधार माना जा रहा है। हालांकि, केवल जाति पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। अन्य समुदायों (ब्राह्मण, मुस्लिम, यादव, बिंद और निषाद) को साथ लिए बिना बड़ी जीत दर्ज करना मुश्किल होगा। उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि उनकी राजनीति किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।

प्रशासनिक अनुभव बनाम चुनावी राजनीति एक पूर्व नौकरशाह के तौर पर दिव्या मित्तल के पास सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक तंत्र की गहरी समझ है। जनता उन्हें उम्मीद भरी नजरों से देख सकती है, लेकिन एक IAS की फाइलें निपटाने वाली छवि और एक नेता की जनता के बीच सक्रिय छवि में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

अंततः, उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह मिर्जापुर के विकास के लिए कितना ठोस एजेंडा पेश करती हैं और कितनी जल्दी अपनी नई पार्टी का जमीनी ढांचा खड़ा कर पाती हैं। मिर्जापुर की जनता के बीच उनकी यह चुनावी परीक्षा बेहद दिलचस्प होने वाली है।

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