तमिलनाडु की सियासत में विजय का उदय: क्या मोदी और थलपति के बीच बन रहा है नया समीकरण?
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चेन्नई में आयोजित विकास परियोजनाओं के शिलान्यास समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की मुलाकात ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। पीएम मोदी द्वारा मंच पर विजय का हाथ थामना और उनके साथ दिखाई गई गर्मजोशी केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि इसे दक्षिण के एक बड़े राजनीतिक बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

पीएम मोदी का सांकेतिक संदेश राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पीएम मोदी भविष्य की राजनीति को भांपने में माहिर हैं। तमिलनाडु में बीजेपी को एक मजबूत सहयोगी की तलाश है। एआईएडीएमके (AIADMK) की कमजोर होती स्थिति और डीएमके (DMK) के साथ वैचारिक मतभेदों के चलते बीजेपी को एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो दक्षिणी राज्य में उसकी पैठ बना सके। थलपति विजय की अपार लोकप्रियता बीजेपी के लिए एक ट्रंप कार्ड साबित हो सकती है।

बीजेपी को फ्रेंडली पार्टनर की तलाश दक्षिण के पांच राज्यों में वर्तमान में बीजेपी की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। आंध्र प्रदेश में सत्ता में साझीदारी के अलावा, अन्य राज्यों में पार्टी संघर्ष कर रही है। तमिलनाडु में यदि विजय और बीजेपी के बीच एक फ्रेंडली केमेस्ट्री बनती है, तो यह केंद्र और राज्य के बीच विकास कार्यों को गति देने का एक जरिया बन सकता है। तमिलनाडु बीजेपी के नेता नैनार नागेंद्रन द्वारा विजय को शॉल ओढ़ाने की घटना भी इसी ओर इशारा करती है, हालांकि पार्टी इसे लोकतांत्रिक शालीनता बताकर कयासों को खारिज कर रही है।

विजय के लिए केंद्र का सहयोग क्यों जरूरी? मुख्यमंत्री विजय वर्तमान में कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के समर्थन से सरकार चला रहे हैं, लेकिन उनके ड्रीम प्रोजेक्ट्स के लिए केंद्र का साथ अनिवार्य है। विजय ने पीएम मोदी के सामने चेन्नई मेट्रो के विस्तार, गोदावरी-कावेरी नदी जोड़ो परियोजना और 5,110 करोड़ रुपये के लंबित फंड जैसे बड़े मुद्दे रखे हैं। इन मांगों को पूरा करने के लिए विजय का केंद्र के प्रति नरम रुख रखना एक रणनीतिक मजबूरी भी हो सकती है।

क्या 2029 तक जारी रहेगा दोहरे लाभ का खेल? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय अभी सेफ गेम खेल रहे हैं। राज्य में कांग्रेस के साथ सरकार चलाना और केंद्र में मोदी सरकार के साथ बेहतर संबंध बनाए रखना, उनके लिए किसी दो हाथों में लड्डू होने जैसा है। अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद तमिलनाडु में कमजोर हुई बीजेपी को भी खुद को फिर से खड़ा करने के लिए एक मजबूत साथी की तलाश है।

क्या यह मुलाकात केवल विकास तक सीमित है या 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए किसी बड़े गठबंधन की नींव रखी जा रही है? इसका जवाब आने वाले समय और राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में ही मिल पाएगा।

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