फ्रांस में चौतरफा संकट: सुलगती सड़कें, नाराज छात्र और दोहरे मापदंडों पर सवाल
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फ्रांस इन दिनों एक गंभीर दौर से गुजर रहा है। सड़कों पर उतरे छात्र, बदहाल स्कूलों के खिलाफ प्रदर्शन और किसानों की टूटती कमर ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया है। बेलगाम महंगाई और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से नौकरियों पर मंडराते खतरे ने जनता के आक्रोश को और भड़का दिया है। सरकार के लिए खाली होते खजाने और जनता के गुस्से के बीच संतुलन बनाना नामुमकिन सा होता जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के दोहरे रवैये पर भारत का तंज इस बीच, भारतीय विदेश मंत्रालय ने फ्रांस में जारी इन विरोध-प्रदर्शनों की ओर इशारा करते हुए संयुक्त राष्ट्र के रुख पर सवाल उठाए हैं। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि जो संस्था भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करती है, उसे अपने आसपास के क्षेत्रों—खासकर फ्रांस जैसे देशों—में हो रही घटनाओं पर भी नजर दौड़ानी चाहिए। उन्होंने साफ किया कि मानवाधिकार के मामलों में इन वैश्विक संस्थाओं का नजरिया पक्षपाती हो सकता है।

क्लासरूम से लेकर सड़कों तक: छात्रों का विद्रोह फ्रांस के शिक्षा तंत्र की बदहाली ने छात्रों को सड़कों पर ला खड़ा किया है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि करीब 500 स्कूलों में पढ़ाई ठप हो गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 20 से अधिक स्कूलों में तोड़फोड़ या आगजनी की घटनाएं हो चुकी हैं। छात्रों का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं का अभाव और शिक्षकों की कमी उनकी भविष्य से खिलवाड़ कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक, फ्रांस में एक कक्षा में औसत 29 विद्यार्थी हैं, जो OECD देशों के औसत से अधिक है, जबकि कुछ शहरों में यह आंकड़ा 36 तक पहुंच जाता है।

किसानों पर मौसम और महंगाई की दोहरी मार फ्रांसीसी किसान सूखे और जलवायु परिवर्तन की भीषण मार झेल रहे हैं। खाद, बिजली और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने खेती की लागत को आसमान पर पहुंचा दिया है। फसल की अनिश्चितता और मुनाफे में कमी के कारण किसानों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। यह असंतोष केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने खाद्य पदार्थों की महंगाई के जरिए हर आम परिवार के बजट को प्रभावित किया है।

आर्थिक दबाव और भविष्य का डर आम फ्रांसीसी नागरिक अब कॉस्ट ऑफ लिविंग (जीवनयापन की लागत) के संकट से जूझ रहे हैं। ऊर्जा की ऊंची कीमतें और आवास के महंगे दाम ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। वहीं, AI के बढ़ते इस्तेमाल से युवाओं में बेरोजगार होने का डर घर कर गया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने सरकार के प्रति अविश्वास को और गहरा कर दिया है।

सरकार के सामने विकट चुनौती फ्रांस की वर्तमान दुर्दशा का कारण कोई एक मुद्दा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था का मिला-जुला संकट है। एक ओर जनता बेहतर सुविधाओं की मांग कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार आर्थिक मंदी और बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबी है। देखना यह है कि क्या मैक्रों सरकार इस चौतरफा सुलगते असंतोष को शांत कर पाएगी या फ्रांस का यह संकट और गहराएगा।

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