दादी की चिता की राख देख फफक पड़े अभिजीत दीपके, पुलिस हिरासत पर खड़े हुए गंभीर सवाल
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हिंगोली (महाराष्ट्र): कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके के लिए उनकी दादी का निधन और अंतिम संस्कार एक दर्दनाक अध्याय बन गया है। दिल्ली पुलिस की हिरासत में रहने के कारण वह समय पर अपने गांव नहीं पहुंच सके, जिससे वह अपनी दादी के अंतिम दर्शन से वंचित रह गए।

चिता की राख पर फूट-फूटकर रोए दीपके सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में दीपके को अपनी दादी की जल चुकी चिता के पास फूल चढ़ाते देखा जा सकता है। हिंगोली स्थित उनके पैतृक गांव संतुक पिंपरी में जब वह पहुंचे, तब तक चिता जलकर राख हो चुकी थी। दादी सावित्रीबाई शंकरराव दीपके (85) का 10 अक्टूबर को निधन हुआ था और अगले दिन उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। राख को देखकर दीपके का संयम टूट गया और वह बिलखते हुए नजर आए।

परिवार ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप दीपके के परिवार का आरोप है कि उन्होंने बार-बार पुलिस से गुहार लगाई कि अभिजीत को रिहा किया जाए ताकि वह अंतिम संस्कार में शामिल हो सकें, लेकिन समय रहते उन्हें अनुमति नहीं दी गई। उनके चाचा विलास दीपके ने कहा कि पुलिस की देरी ने उन्हें आखिरी मुलाकात के अधिकार से वंचित कर दिया।

पुलिस ने दावों को नकारा, जारी किया वीडियो विवाद बढ़ता देख दिल्ली पुलिस ने अपना पक्ष रखा। पुलिस का दावा है कि उन्होंने मानवीय आधार पर अभिजीत को दादी के निधन की सूचना दी थी और घर जाने के लिए यात्रा की व्यवस्था करने की भी पेशकश की थी। पुलिस के मुताबिक, अभिजीत ने उस समय घर जाने से इनकार कर दिया था।

अधूरा वीडियो और अनसुलझे सवाल वहीं, अभिजीत दीपके ने पुलिस के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस द्वारा जारी वीडियो अधूरा है। उनका कहना है कि उन्हें अपने परिवार से बात करने के लिए फोन तक नहीं दिया गया और कानूनी मदद लेने में भी बाधा डाली गई। मामले में अभी भी सच्चाई को लेकर दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं।

जमानत की शर्तें और भविष्य की चुनौतियां हिरासत से रिहा होने के बाद एक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने दीपके को 50,000 रुपये के बॉन्ड पर जमानत दी है। इस बॉन्ड के तहत उन्हें एक साल तक शांति व्यवस्था बनाए रखने की शर्त का पालन करना होगा। यदि वह इसका उल्लंघन करते हैं, तो उन्हें यह जुर्माना भरना पड़ सकता है। रिहाई के बाद दीपके ने अपना आंदोलन जारी रखने की बात कही है, जिस पर अब लोगों की नजरें टिकी हैं कि क्या यह कानूनी पचड़ों और व्यक्तिगत दुखों के बीच उनके संघर्ष पर असर डालेगा।

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