ऊर्जा पिशाच बन रहे डेटा सेंटर, ऐमजॉन की भारी परियोजना से मुंबई के निवासियों में मची खलबली
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ठाणे में अपने नए घर में शिफ्ट हुए इंजीनियर तुषार शेट्टी को कभी नहीं लगा था कि उनकी खिड़की से दिखने वाला खूबसूरत हरा-भरा नज़ारा एक दिन लाल मिट्टी के गड्ढे में बदल जाएगा। यहाँ ऐमजॉन अपना विशाल डेटा सेंटर बना रही है। तुषार जैसे सैकड़ों निवासी अब इस प्रोजेक्ट का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

एनर्जी वैम्पायर का आतंक

8 अक्टूबर को निर्माण स्थल पर जुटे स्थानीय निवासियों के हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर साफ लिखा था- डेटा सेंटर ऊर्जा के पिशाच हैं। लोगों को डर है कि ये सेंटर उनके इलाके की बिजली और पानी की आपूर्ति को सोख लेंगे। 62 वर्षीय वसुधा शेट्टी कहती हैं, अगर यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ा, तो हम यहां से चले जाएंगे।

एआई की भूख: पानी और बिजली की भारी खपत

चैटजीपीटी जैसे एआई मॉडल को चलाने के लिए हजारों जीपीयू (GPU) की जरूरत होती है। ये चिप्स बहुत गर्मी पैदा करते हैं, जिसे ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में ताजे पानी के चिलर्स का उपयोग होता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, 2027 तक एआई सर्वर को 6.6 अरब घन मीटर पानी की आवश्यकता होगी। भारत जैसे देश में, जहां पीने के पानी का संकट पहले से ही गहरा है, वहां यह डेटा सेंटर एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

भारत ही क्यों चुन रही हैं टेक कंपनियां?

चीन के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी सुरक्षा चिंताओं के कारण, अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां भारत को अपना नया बेस बना रही हैं। रिलायंस, टाटा ग्रुप और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां भारत में अरबों डॉलर के निवेश से विशाल डेटा सेंटर बना रही हैं। सरकार इसे रोजगार के अवसर के रूप में देख रही है, जबकि पर्यावरणविद इसे भविष्य के संसाधन संकट के रूप में।

सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर में विरोध

डेटा सेंटरों का विरोध केवल भारत में नहीं, बल्कि वर्जीनिया (अमेरिका), एम्स्टर्डम और डबलिन में भी हो रहा है। वर्जीनिया में तो जनता के भारी दबाव के चलते ऐमजॉन को अपने तीन प्रोजेक्ट रोकने पड़े थे। हालांकि, टेक दिग्गज 2030 तक इन समस्याओं का समाधान ढूंढने का दावा कर रहे हैं, पर तब तक पर्यावरण और स्थानीय निवासियों का संघर्ष जारी रहने के आसार हैं।

⚛ विज्ञान और प्रौद्योगिकी

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