प्रदर्शन या हकीकत से खिलवाड़? दिल्ली पुलिस पर हमलों ने खड़े किए सुरक्षा और अधिकारों पर सवाल
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राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ हुई बदसलूकी और हिंसा ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को न केवल धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ा, बल्कि उन्हें जमीन पर घसीटने और पीटने के भी मामले सामने आए हैं।

मेरे सम्मान और अधिकारों का क्या?

सोशल मीडिया पर वायरल हुए कई वीडियो ने पुलिसकर्मियों की व्यथा को बयां कर दिया है। अशोक रोड पर ड्यूटी कर रहे एक हेड कांस्टेबल ने भावुक होते हुए पूछा, लोग कहते हैं कि विरोध करना उनका मौलिक अधिकार है, लेकिन एक पुलिसकर्मी के मानवाधिकारों का क्या?

पिड़ित पुलिसकर्मियों का कहना है कि वे भी इंसान हैं और उनके परिवार भी हैं। ड्यूटी के दौरान हुई हिंसा के वीडियो देखकर उनके परिजन और रिश्तेदार बेहद चिंतित हैं, जिससे न केवल उनका मनोबल गिर रहा है, बल्कि उनके व्यक्तिगत सम्मान को भी गहरी ठेस पहुंची है।

महिला पुलिसकर्मियों की आपबीती

महिला सुरक्षाकर्मियों के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। विंडसर प्लेस में तैनात एक महिला सब-इंस्पेक्टर ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान पुरुष प्रदर्शनकारियों द्वारा उनके साथ बदसलूकी की जाती है। कई महिला कर्मियों ने उन पर थूकने, नेमप्लेट फाड़ने और शारीरिक चोट पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए हैं।

इन सब के बावजूद, महिला पुलिसकर्मियों का जज्बा कम नहीं हुआ है। एक महिला कांस्टेबल ने कहा, हमें डॉक्टर के पास जाने तक का समय नहीं मिलता, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है। बुरा लगता है, पर हम काम पर जाने के लिए मजबूर हैं।

क्या सुरक्षा उपकरणों में थी चूक?

प्रदर्शन के दौरान पुलिस के पास दंगा-रोधी उपकरण या लाठियां न होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। इस पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि शुरुआती तैनाती शांतिपूर्ण प्रदर्शन के आकलन के आधार पर की गई थी। अधिकारियों के मुताबिक, भारी सुरक्षा गियर का इस्तेमाल आमतौर पर तभी किया जाता है जब पत्थरबाजी या हिंसक स्थिति की स्पष्ट आशंका हो।

फिलहाल, राजधानी में पुलिसकर्मियों के साथ हो रही इस हिंसा ने एक बड़ा नैतिक प्रश्न खड़ा कर दिया है। वर्दी के सम्मान और प्रदर्शन की आजादी के बीच की यह पतली रेखा अब सुरक्षाबलों के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है।

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