अभिनय के युग का अंत: नाना पाटेकर पंचतत्व में विलीन, राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई
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पुणे: हिंदी और मराठी सिनेमा के शिखर पुरुष नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। गुरुवार, 8 अक्टूबर को पुणे के डोंजे गांव में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने उन्हें मुखाग्नि दी। 75 वर्ष की उम्र में गोवा में उनका निधन हुआ था, जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को उनके गृह क्षेत्र पुणे लाया गया।

अभिनय का एक बेमिसाल सफर नाना पाटेकर का अभिनय करियर किसी किंवदंती से कम नहीं रहा। उनकी भारी आवाज और संवाद बोलने का अनूठा अंदाज दर्शकों के जेहन में हमेशा ताजा रहेगा। परिंदा , क्रांतिवीर , अग्निपथ , अब तक छप्पन और नटसम्राट जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का एक स्तंभ बनाया। उन्होंने अपनी अदाकारी से गंभीर और भावनात्मक किरदारों में जो जान फूंकी, वह आज भी अभिनय की पाठशाला मानी जाती है।

पुरस्कारों और उपलब्धियों का शिखर अपनी कला के प्रति समर्पित नाना पाटेकर को तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी अलंकृत किया गया था। रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर निर्देशन तक पहुंचा, जहां उन्होंने प्रहार: द फाइनल अटैक जैसी प्रभावशाली फिल्म का निर्देशन भी किया।

मददगार हाथ और सामाजिक चेतना नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े एक संवेदनशील इंसान भी थे। किसानों की समस्याओं और ग्रामीण भारत के संघर्षों के लिए उनकी सक्रियता जगजाहिर थी। उन्होंने पर्दे के पीछे भी कई जरूरतमंदों की मदद की, जिससे उन्हें एक मसीहा के रूप में भी पहचान मिली। उन्होंने अपने अभिनय के जरिए समाज की कुरीतियों और मानवीय संवेदनाओं को हमेशा आईना दिखाया।

फिल्म जगत में शोक की लहर उनके निधन की खबर से पूरा कला जगत स्तब्ध है। उनके साथ काम करने वाले साथी कलाकारों और निर्देशकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है। हालांकि नाना पाटेकर भौतिक रूप से अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार और उनके द्वारा कहे गए संवाद भारतीय सिनेमा के इतिहास में युगों-युगों तक जीवित रहेंगे। उनका जाना एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसे दोहरा पाना असंभव है।

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