देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों के बीच 42 पूर्व न्यायाधीशों ने एक साझा खुला पत्र जारी कर गंभीर चिंता जताई है। इन पूर्व जजों ने निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर बिना ठोस सबूत के लगाए जा रहे वोट चोरी जैसे आरोपों को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है।
आधारहीन आरोपों से संस्थाओं को नुकसान पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार चोर या समझौता कर चुके बताना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे जनता का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा भी उठ सकता है। पूर्व जजों ने जोर देकर कहा कि बिना पर्याप्त साक्ष्यों के ऐसी गंभीर टिप्पणियां करना किसी भी जिम्मेदारीपूर्ण व्यवहार का हिस्सा नहीं है।
आलोचना और बदनामी में फर्क पूर्व न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि वे आलोचना के खिलाफ नहीं हैं। पत्र के अनुसार, लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन संस्थाओं को बदनाम करना पूरी तरह से अलग बात है। उन्होंने नसीहत दी कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए संवैधानिक मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है।
संस्थाओं की विश्वसनीयता सर्वोपरि इस पत्र पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस हेमंत गुप्ता, जस्टिस पंकज मित्तल समेत देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और जजों ने हस्ताक्षर किए हैं। इन सभी का मानना है कि निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बनाए रखना देश के हित में है।
भविष्य के लिए चेतावनी इन दिग्गजों का यह कदम उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो आए दिन चुनावी प्रक्रियाओं और न्यायिक फैसलों पर बिना आधार के सवाल उठाते हैं। पत्र का सार यही है कि जब तक किसी के पास ठोस सबूत न हों, तब तक संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछालना देश की नींव को कमजोर करने के समान है।
In an open letter, 42 former judges have expressed grave concern over attempts to undermine the Election Commission, judiciary and other constitutional institutions.
— Press Trust of India (@PTI_News) October 8, 2026
The signatories have questioned allegations of “vote theft” without supporting evidence, warning that repeatedly… pic.twitter.com/OrqRpant3P
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