सिंगापुर से पटना लौटीं रोहिणी आचार्य: मामा साधु यादव से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी, क्या छपरा से फिर लड़ेंगी चुनाव?
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लगभग 11 महीने बाद लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य सिंगापुर से पटना लौटी हैं। रोहिणी ने भले ही अपनी इस वापसी को पूरी तरह से निजी और पारिवारिक बताया है, लेकिन उनके पटना आते ही शुरू हुए घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

पारिवारिक मुलाकात या राजनीतिक संदेश?

पटना लौटते ही रोहिणी ने स्पष्ट किया था कि वह केवल अपने माता-पिता से मिलने आई हैं और इसे राजनीति से न जोड़ा जाए। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद उनका अपने मामा साधु यादव के घर जाना सभी को चौंका गया। रोहिणी ने न केवल मामा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, बल्कि लंबे अर्से बाद हुई इस मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है।

साधु यादव का बड़ा दावा

मुलाकात के बाद साधु यादव ने इसे पारिवारिक बताया, लेकिन साथ ही एक बड़ा सियासी बयान भी दे दिया। उन्होंने दावा किया कि रोहिणी को फिर से चुनाव लड़ना चाहिए। साधु यादव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर रोहिणी छपरा (सारण) से चुनाव लड़ती हैं, तो उन्हें उनका पूरा समर्थन मिलेगा। उनके इस बयान ने मुलाकात को सामान्य शिष्टाचार से उठाकर सीधे चुनावी मैदान के दांव-पेंच में बदल दिया है।

क्या छपरा ही है अगला रणक्षेत्र ?

छपरा सीट का जिक्र होते ही चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि रोहिणी आचार्य 2024 का लोकसभा चुनाव इसी सीट से लड़ चुकी हैं, जहां उन्हें बीजेपी के राजीव प्रताप रूडी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। साधु यादव का छपरा को लेकर दिया गया बयान इस ओर इशारा करता है कि क्या रोहिणी दोबारा अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन पर वापसी की तैयारी कर रही हैं?

विवादों और दूरियों का पुराना इतिहास

रोहिणी की इन गतिविधियों को 2025 के उस दौर से जोड़कर देखा जा रहा है, जब परिवार के भीतर तेजस्वी यादव और रोहिणी के बीच कथित अनबन सार्वजनिक हुई थी। उस समय रोहिणी ने तेजस्वी के करीबियों पर सवाल उठाए थे और राजनीति से दूरी बना ली थी। रोचक बात यह है कि उस विवाद के दौरान भी साधु यादव खुलकर रोहिणी के पक्ष में खड़े थे और तेजस्वी पर तीखे प्रहार किए थे।

तस्वीर अभी बाकी है साफ होना

फिलहाल, आरजेडी या स्वयं रोहिणी आचार्य की ओर से चुनावी राजनीति में फिर से उतरने या छपरा से दावेदारी की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। साधु यादव का बयान केवल एक राजनीतिक कयास का हिस्सा है या किसी बड़ी रणनीति का संकेत, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि रोहिणी की पटना वापसी अब महज घर तक सीमित नहीं रह गई है।

क्या यह उनकी राजनीति में दूसरी पारी की शुरुआत है या सिर्फ एक पारिवारिक मेल-मिलाप? बिहार की राजनीति के जानकार इस घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं।

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