नौकरशाही से सियासत तक: दिव्या मित्तल के बाद एम नागेश्वर राव की एंट्री, क्या यूपी में बदल रहा ट्रेंड?
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भारतीय राजनीति में प्रशासनिक अधिकारियों का आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ समय में रिटायरमेंट या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के बाद पूर्व नौकरशाहों की सक्रियता ने नई बहस छेड़ दी है। हाल ही में पूर्व CBI निदेशक एम. नागेश्वर राव ने वाराणसी में सर्वजन सनातन पार्टी लॉन्च कर सियासत में कदम रखा है।

कौन हैं एम. नागेश्वर राव?

1986 बैच के ओडिशा कैडर के IPS अधिकारी रहे एम. नागेश्वर राव ने करीब चार दशक तक पुलिस और जांच एजेंसियों में सेवाएं दीं। कोयला तस्करी के खिलाफ कार्रवाई और ओडिशा में चक्रवात के दौरान आपदा प्रबंधन में उनके काम को काफी सराहा गया। उन्हें ओडिशा सरकार का पहला लोक सेवा में उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिला। अपने करियर के दौरान वे CBI के अंतरिम निदेशक पद तक पहुंचे।

विवादों से रहा नाता

नागेश्वर राव का करियर विवादों से अछूता नहीं रहा। CBI के अंतरिम निदेशक के रूप में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस के दौरान विवादित तबादलों की वजह से उन्हें सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी झेलनी पड़ी। कोर्ट ने उन्हें अवमानना का दोषी मानते हुए ₹1 लाख का जुर्माना लगाया और कोर्ट उठने तक कोने में बैठने की सजा दी थी।

यूपी में बढ़ रहा सिलसिला: 13 IAS ने छोड़ी नौकरी

उत्तर प्रदेश में 2017 से अब तक प्रशासनिक सेवा छोड़ने का ट्रेंड बढ़ा है। आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में 9 IAS अधिकारियों ने VRS लिया और 4 ने इस्तीफा दिया। इसमें आर.पी. सिंह, रेणुका कुमार और अनामिका सिंह जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं। हाल ही में पूर्व IAS दिव्या मित्तल का इस्तीफा भी काफी चर्चा में रहा, जिन्होंने सरकारी सेवा छोड़ने के बाद राजनीति में आने के संकेत दिए हैं।

क्या सरकार से है नाराजगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि सेवा छोड़ने वाले हर अधिकारी को सरकार से नाराज मानना सही नहीं है। कुछ अधिकारी नई भूमिकाएं तलाशने के लिए ऐसा करते हैं, तो कुछ व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हैं। हालांकि, विपक्ष इसे सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के मौके के रूप में देख रहा है। पूर्व IAS राकेश वर्मा जैसे अधिकारी पहले ही कांग्रेस में शामिल होकर अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर चुके हैं।

2027 के चुनाव और बदलती तस्वीर

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं। प्रशासनिक अनुभव रखने वाले ये अधिकारी शासन और कानून-व्यवस्था की बारीकियों को समझते हैं, लेकिन इस अनुभव को चुनावी जीत में बदलना बड़ी चुनौती है। नौकरशाही से राजनीति में आने की यह बढ़ती तादाद केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है या यूपी की सियासत में कोई बड़ा बदलाव, इसका जवाब आने वाले चुनावों के नतीजों में ही मिलेगा।

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