लैपटॉप बनाम पर्ची वाला बाबा : नीतू मैम का तीखा हमला, अखिलेश की तारीफ में कही ये बात
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लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया पार्क में आयोजित संकल्प शिक्षक-अभ्यर्थी संवाद कार्यक्रम में मशहूर इंग्लिश एजुकेटर नीतू सिंह ने मौजूदा राजनीतिक और शैक्षणिक व्यवस्था पर जोरदार निशाना साधा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से अखिलेश यादव की पुरानी योजनाओं और वर्तमान दौर की तुलना करते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए।

2013 का विजन बनाम आज का दौर नीतू सिंह ने अखिलेश यादव की उपस्थिति में 2013 के दौर को याद किया। उन्होंने कहा, जब मैं अखिलेश जी को देखती हूं, तो मुझे 13 साल पहले का समय याद आता है। उस वक्त सरकार ने युवाओं को लैपटॉप बांटे थे, जो एक आधुनिक विजन का हिस्सा था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज स्थिति यह है कि पर्ची वाला बाबा युवाओं का भविष्य तय कर रहा है।

पाखंड और चमत्कार के जाल में युवा नीतू सिंह ने शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे पाखंड के साये पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज युवाओं को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि केवल भक्ति और चमत्कार से सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने इसे युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि रोजगार को लेकर आज का युवा बहुत निराश और हताश है।

परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया की विफलता नीतू सिंह ने भर्ती परीक्षाओं में व्याप्त अराजकता पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि परीक्षाओं का कोई निश्चित कैलेंडर नहीं है। अक्सर भर्ती प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मामले अदालतों में चले जाते हैं। उन्होंने आयोग के सवालों पर उठने वाले विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि भर्ती बोर्ड के विरोधाभासी जवाबों का खामियाजा केवल परीक्षार्थियों को भुगतना पड़ता है।

TET और Super TET पर उठाए बड़े सवाल शिक्षा प्रणाली की खामियों को गिनाते हुए उन्होंने कहा, नियम के अनुसार यूपी टीईटी (TET) साल में दो बार होनी चाहिए, लेकिन अब यह पांच साल में एक बार हो रही है। उन्होंने सुपर टीईटी में सीटों की संख्या को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने बताया कि जहां 1 लाख 26 हजार भर्तियां होनी चाहिए थीं, वहां केवल 11,500 पदों पर भर्ती की गई, जिसे सरकार अपनी उपलब्धि बता रही है।

सरकार से टकराव पर दो टूक जब उनसे सरकार के साथ अक्सर होने वाले टकरावों के बारे में पूछा गया, तो नीतू सिंह ने कहा कि वह जानबूझकर विवाद नहीं चाहतीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षक और अभ्यर्थी अपना हक मांगते हैं और जब उनकी आवाज दबाई जाती है, तो उनके साथ खड़े होना उनकी नैतिकता बन जाती है।

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