पेट्रोल-डीजल हुआ महंगा: नायरा एनर्जी ने बढ़ाई कीमतें, आम आदमी की जेब पर पड़ा सीधा असर
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नई दिल्ली: देश में ईंधन की कीमतों को लेकर शनिवार (3 अक्टूबर) को एक बड़ा अपडेट सामने आया है। निजी क्षेत्र की तेल कंपनी नायरा एनर्जी ने पेट्रोल के दाम में 5 रुपये और डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। बढ़ी हुई कीमतें आज सुबह से कंपनी के देशभर में फैले 7,108 फ्यूल स्टेशनों पर लागू हो गई हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार का दबाव यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी हुई हैं। रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की लागत में वृद्धि के कारण कंपनियों के मार्जिन पर भारी दबाव था। नायरा एनर्जी का कहना है कि बढ़ती लागत के बीच पुराने दाम पर ईंधन बेचना संभव नहीं था।

सरकारी कंपनियों के दाम स्थिर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फिलहाल सिर्फ नायरा एनर्जी ने कीमतें बढ़ाई हैं। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने अपने पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई बदलाव नहीं किया है। चूंकि देश के 90 फीसदी से ज्यादा फ्यूल आउटलेट सरकारी कंपनियों के पास हैं, इसलिए आम जनता पर इसका व्यापक असर फिलहाल सीमित है।

कीमतों का उतार-चढ़ाव यह कोई पहली बार नहीं है जब नायरा ने दामों में बड़ा फेरबदल किया है। इसी साल 26 मार्च को कंपनी ने इतनी ही बढ़ोतरी की थी, जिसे 1 जुलाई को वापस ले लिया गया था। अब अक्टूबर में कच्चे तेल की तेजी को देखते हुए कंपनी ने फिर से पुरानी दरों को प्रभावी कर दिया है।

क्या आम आदमी पर बढ़ेगा महंगाई का बोझ? विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो अन्य तेल कंपनियां भी अपने मार्जिन के नुकसान को कम करने के लिए कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती हैं। डीजल की कीमतों में इजाफे का सीधा असर माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ता है, जिससे भविष्य में दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं।

कंपनियों के नुकसान का गणित हालिया रिपोर्टों के अनुसार, तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर प्रति लीटर काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। आईसीआरए (ICRA) के आकलन के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल और एलपीजी को मिलाकर कंपनियों को रोजाना करीब 530 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था। नायरा का यह कदम इसी वित्तीय दबाव को कम करने की एक कोशिश माना जा रहा है। अब नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकारी कंपनियां भी इस राह पर चलेंगी।

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