बैन की बेड़ियाँ तोड़ परवीन का गोल्डन पंच : कैंसर से लड़ते पिता और दूध बेचती माँ, संघर्षों से निकली चैंपियन की कहानी
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रोहतक का जश्न हरियाणा के रोहतक जिले का रुड़की गांव इन दिनों किसी त्योहार से कम नहीं है। हर घर में मिठाइयां बंट रही हैं और जश्न का माहौल है। मौका ही ऐसा है—गांव की बेटी 26 वर्षीय परवीन हुड्डा ने एशियन गेम्स (आईची-नागोया) में महिलाओं की 65 किलो वेट कैटेगरी में स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) जीतकर देश का मान बढ़ाया है।

अतीत का साया और वापसी परवीन का यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (WADA) ने उन्हें वेयरअबाउट्स फेलियर के कारण 22 महीने के लिए बैन कर दिया था। इस बड़े झटके के बाद रिंग में वापसी करना और सीधे स्वर्ण पदक जीतना उनके मजबूत इरादों को दर्शाता है।

नशे के खिलाफ लड़ाई बनी करियर की नींव परवीन के बॉक्सिंग सफर की शुरुआत 2011 में हुई। उनके कोच सुधीर ने गांव में शराब और ड्रग्स के बढ़ते चलन के बीच युवाओं को सही दिशा देने के लिए एक एकेडमी शुरू की थी। बेहद अनुशासित परवीन ने तभी अपनी प्रतिभा दिखा दी थी, जब उन्होंने नेशनल सब-जूनियर चैंपियनशिप में गोल्ड जीतकर कोच के भरोसे को सही साबित किया।

जीवन के रिंग में संघर्ष परवीन सिर्फ विरोधियों से नहीं, बल्कि गरीबी और बीमारी से भी लड़ी हैं। उनके पिता लखपत पिछले चार साल से कैंसर और हृदय रोग से जूझ रहे हैं। घर का खर्च चलाने के लिए उनकी माँ नीलम भैंस का दूध बेचती हैं। एक समय ऐसा आया था जब घर की इकलौती भैंस मर गई और परवीन ने खेल छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन उनके कोच सुधीर ने उन्हें जरूरी किट और डाइट मुहैया कराकर खेल जारी रखने में मदद की।

एक नई उम्मीद और नई जिम्मेदारी अब ITBP में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत परवीन अपने परिवार का मुख्य सहारा हैं। वह न केवल भारत की बेटियों के लिए प्रेरणा बनी हैं, बल्कि अपनी तकनीक, शानदार फुटवर्क और विपक्षी खिलाड़ियों पर दबाव बनाने की क्षमता के कारण भारत की शीर्ष मुक्केबाजों में गिनी जाती हैं।

भारत के लिए ऐतिहासिक एशियन गेम्स एशियन गेम्स 2026 में मुक्केबाजी के लिहाज से भारत का प्रदर्शन यादगार रहा। परवीन के साथ लवलीना बोरगोहेन और अंकुश पंघाल ने भी गोल्ड जीतते हुए गोल्डन हैट्रिक पूरी की। भारत ने कुल तीन गोल्ड समेत छह पदक जीतकर एशियाई खेलों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। परवीन का यह गोल्ड सिर्फ एक मेडल नहीं, बल्कि उस हर जज्बे की जीत है जो अभावों में भी हार नहीं मानता।

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