गांधी जयंती पर राज ठाकरे का तंज: लोकतंत्र सिर्फ माला चढ़ाने से नहीं, विचारों से बचता है
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महात्मा गांधी की 156वीं जयंती के अवसर पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों पर निशाना साधते हुए कहा कि आज के दौर में महापुरुषों को याद करना केवल तस्वीरों तक सीमित रह गया है।

फोटो खिंचवाने का चलन राज ठाकरे ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि महान हस्तियों का सम्मान अब केवल औपचारिकताओं में बंध गया है। लोग स्मारकों पर जाते हैं, मूर्तियों पर माला चढ़ाते हैं और तस्वीरें खिंचवाते हैं। उन्होंने इसे श्रद्धांजलि देने का एक खोखला तरीका करार दिया है। उनके अनुसार, यह दिखावा उस असली संदेश को मार रहा है जिसे गांधीजी ने हमें सौंपा था।

असहमति को राष्ट्र-विरोधी बताने का खेल राज ठाकरे ने देश में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज अगर कोई सरकार से सवाल पूछता है, तो सत्ताधारी दल और ऑनलाइन ट्रोल आर्मी तुरंत उसे राष्ट्र-विरोधी करार दे देती है। ठाकरे ने साफ कहा कि गांधीजी की सबसे बड़ी विरासत जनता को वह आवाज देना था, जिससे वे सत्ता की मनमानी के खिलाफ खडे़ हो सकें, लेकिन आज उस आवाज को दबाया जा रहा है।

संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल मनसे प्रमुख ने देश की संवैधानिक संस्थाओं पर मंडरा रहे खतरे को लेकर भी आगाह किया। उन्होंने चुनाव आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्वायत्तता कम होने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बलपूर्वक कुचले जाने पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि सरकार के पास कानून और ताकत है, लेकिन वह लोगों की स्वतंत्र सोच या उनके जमीर पर कब्जा नहीं कर सकती।

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के प्रोपेगैंडा से सावधान आज के डिजिटल युग में फैल रहे भ्रामक नैरेटिव पर भी ठाकरे ने निशाना साधा। उन्होंने नागरिकों को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और सोशल मीडिया पर चल रहे प्रायोजित प्रोपेगैंडा से सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों को अपनी तर्कसंगत सोच को किसी भी हाल में कमजोर नहीं होने देना चाहिए।

लोकतंत्र के लिए सड़कों पर उतरना जरूरी राज ठाकरे ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि सड़कों पर उतरकर शांतिपूर्ण आंदोलन करना और प्रशासन को जवाबदेह ठहराना नागरिक का अधिकार है। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि भारतीय लोकतंत्र की रक्षा तभी हो सकती है जब हम गांधीजी के शांतिपूर्ण प्रतिरोध और नैतिक साहस के रास्ते पर फिर से चलें, न कि केवल उनकी मूर्ति के सामने नतमस्तक हों।

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