शाहजहांपुर में दहला देने वाली वारदात: मंदिर के तख्त से बांधकर दो साधुओं को जिंदा जलाया?
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उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुई एक भयावह घटना ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया है। खुदागंज थाना क्षेत्र के सूथा गांव स्थित एक हनुमान मंदिर में दो बुजुर्ग साधुओं की निर्मम हत्या कर दी गई। शुरुआती जांच में सामने आया है कि दोनों को तख्त से बांधकर आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने मुख्य आरोपी सुमित सिंह को गिरफ्तार कर लिया है।

घटना का वीभत्स विवरण मृतकों की पहचान बाबा गोपाल दास और बाबा बिहारी दास के रूप में हुई है, जो लंबे समय से मंदिर में रहकर पूजा-पाठ और सेवा करते थे। ग्रामीणों का आरोप है कि आरोपी सुमित ने मंदिर परिसर की लाइटें काटने के बाद साधुओं को पहले पीटा, फिर उन्हें तख्त से बांधकर लकड़ियों के ढेर में आग लगा दी। घटना में दोनों की दर्दनाक मौत हो गई।

मौत का सच: फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या साधुओं को जिंदा जलाया गया या पहले उनकी हत्या की गई थी? शाहजहांपुर के एसपी सौरभ दीक्षित ने बताया कि पुलिस इस हर पहलू की जांच कर रही है। पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि उनकी मृत्यु का सटीक कारण क्या था।

जमीन विवाद या धार्मिक साजिश? फिलहाल जांच में मंदिर की विवादित जमीन का एंगल सबसे मजबूत लग रहा है। आरोपी सुमित और इन साधुओं के बीच जमीन के मालिकाना हक को लेकर पुराना विवाद चल रहा था। हालांकि, मामला मंदिर परिसर से जुड़ा होने के कारण इसे धार्मिक हत्या के नजरिए से भी देखा जा रहा है, लेकिन पुलिस प्रशासन अभी पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर ही किसी नतीजे पर पहुंचने की बात कह रहा है।

आरोपी का आपराधिक इतिहास आरोपी सुमित सिंह के बारे में ग्रामीणों का दावा है कि वह करीब दो महीने पहले ही जेल से बाहर आया था। उसके खिलाफ पूर्व में आगजनी और एससी-एसटी एक्ट जैसे मामले दर्ज होने की चर्चा है। पुलिस अब उसके पुराने मुकदमों और इस वारदात के पीछे की उसकी मंशा की गहन पड़ताल कर रही है।

पालघर और आजमगढ़ से तुलना क्यों? इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर 2020 के पालघर साधु हत्याकांड की चर्चा छिड़ गई है। हालांकि, तुलना करना जल्दबाजी होगी क्योंकि पालघर में मामला भीड़ हिंसा और अफवाहों से प्रेरित था, जबकि शाहजहांपुर मामले में अब तक जमीनी विवाद और निजी रंजिश सामने आई है। वहीं, हाल ही में आजमगढ़ में हुए पुजारियों के हत्याकांड से भी इसे जोड़कर देखा जा रहा है, जिसने प्रदेश में पुजारियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

चुनावी राज्य में बढ़ता राजनीतिक दबाव यूपी में अगले विधानसभा चुनाव से पहले साधुओं की इस तरह की हत्याएं एक संवेदनशील मुद्दा बन गई हैं। अब विपक्षी दल और समाज के विभिन्न वर्ग मंदिर और पुजारियों की सुरक्षा को लेकर सरकार से जवाब मांग रहे हैं। जांच के दौरान यह पता लगाना बेहद जरूरी होगा कि क्या पुलिस की लापरवाही के कारण यह विवाद इतना बढ़ा कि मामला हत्या तक पहुंच गया। फिलहाल, पुलिस की कार्रवाई और फॉरेंसिक साक्ष्य ही इस मामले की दिशा तय करेंगे।

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