क्या अब अमेरिका से हथियार खरीदेगा चीन? ट्रंप के इस प्रस्ताव से वैश्विक कूटनीति में खलबली
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अमेरिकी हथियार खरीदने का प्रस्ताव देने का खुलासा हुआ है। इस जानकारी के सामने आते ही कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

यह खुलासा चीन में अमेरिकी राजदूत डेविड परड्यू ने एक इंटरव्यू के दौरान किया। उन्होंने बताया कि ट्रंप ने शी जिनपिंग से सीधा सवाल किया था कि क्या चीन अमेरिकी हथियार प्रणालियों को खरीदने में दिलचस्पी रखता है।

ताइवान नीति और ट्रंप का बिजनसमैन अंदाज

राजदूत परड्यू के अनुसार, जब ट्रंप ताइवान को हथियार बेचने के अपने फैसले को सही ठहरा रहे थे, तभी उन्होंने शी जिनपिंग से यह चौंकाने वाला प्रस्ताव रखा। ट्रंप का तर्क था कि अमेरिका पूरी दुनिया में हथियार बेचता है, तो ताइवान भी उसी का हिस्सा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह रवैया उनकी डीलमेकिंग शैली को दर्शाता है। वे अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को भी व्यापारिक सौदेबाजी के दायरे में लाने से नहीं हिचकिचाते।

क्यों हैरान है पूरी दुनिया?

चीन पर 1989 के तियानमेन चौक नरसंहार के बाद से अमेरिका ने सख्त हथियार प्रतिबंध लगा रखे हैं। ट्रंप का यह प्रस्ताव दशकों पुरानी अमेरिकी नीति के विपरीत है। यदि यह डील आगे बढ़ती, तो अत्याधुनिक अमेरिकी सैन्य तकनीक उस देश के हाथों में चली जाती, जिसे खुद अमेरिका अपना सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है।

भारत की चिंताएं बढ़ीं

यह खबर भारत के लिए भी चिंता का विषय हो सकती है। चीन और भारत के बीच तनाव जगजाहिर है। यदि अमेरिका और चीन के बीच हथियारों का कोई भी समझौता होता है, तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा समीकरणों पर पड़ेगा। इसके अलावा, पाकिस्तान भी इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है।

ताइवान विवाद का पेच

ताइवान को हथियारों की आपूर्ति अमेरिका और चीन के बीच विवाद की मुख्य जड़ है। दिसंबर 2025 में अमेरिका ने ताइवान को 11 अरब डॉलर के हथियारों की मंजूरी दी थी। वहीं, चीन बार-बार इन बिक्री को रोकने का दबाव बनाता रहा है। ट्रंप ने पहले ताइवान की हथियार बिक्री को चीन के साथ बातचीत का एक मोहरा बताया था, जिस पर काफी विवाद भी हुआ था।

सांसदों का क्या कहना है?

अमेरिकी संसद के दोनों दलों के सांसदों ने चिंता जताई है कि ताइवान के हथियारों के ऑर्डर में देरी से उसकी सुरक्षा क्षमता कमजोर हो रही है। हालांकि, राजदूत परड्यू ने ट्रंप का बचाव करते हुए दावा किया कि ट्रंप ने 1979 के बाद से किसी भी राष्ट्रपति की तुलना में ताइवान को 50 प्रतिशत अधिक हथियार बेचे हैं।

फिलहाल, इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है कि क्या यह महज ट्रंप की एक कूटनीतिक चाल थी या वे वास्तव में चीन के साथ रक्षा संबंधों का नया अध्याय खोलना चाहते हैं।

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