चुनाव आयोग के खिलाफ छेड़ी गई जंग: क्या राहुल गांधी ने CJP के हाथों से छीन ली आंदोलन की कमान?
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मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छिड़ी सियासी आग अचानक नहीं भड़की है। इस विवाद की नींव कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके द्वारा उठाए गए सवालों ने रखी थी। दिपके ने 2 अक्टूबर से आंदोलन का ऐलान कर कांग्रेस के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाने का दबाव बना दिया था।

विपक्ष का नैरेटिव: राजनीति या अस्तित्व की लड़ाई? अभिजीत दिपके ने विपक्षी दलों की कमजोर नस पर चोट करते हुए कहा था कि पार्टियां केवल दिखावे के लिए विरोध करती हैं और धांधली वाले चुनावों को मान्यता देती हैं। युवाओं के बीच CJP का बढ़ता प्रभाव कांग्रेस के लिए चेतावनी था। कांग्रेस को डर सता रहा था कि अगर वे सड़क पर नहीं उतरे, तो युवाओं के बीच उनका नेतृत्व खत्म हो जाएगा। नतीजतन, कांग्रेस ने 2 अक्टूबर का इंतजार किए बिना 25 सितंबर को ही राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ दिया।

आयोग के भीतर की दरार बनी पेट्रोल इस पूरे मामले में आग लगाने का काम एक मीडिया रिपोर्ट ने किया, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर आपत्ति जताई थी। वोटर लिस्ट में बदलाव और फॉर्म 6 के नियमों पर उठे इन सवालों ने विपक्ष को एक बड़ा हथियार दे दिया। राहुल गांधी ने इसे तुरंत लपकते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर दी।

देशभर में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन शुक्रवार को कांग्रेस ने दिल्ली से लेकर पटना और असम तक जबरदस्त प्रदर्शन किया। दिल्ली में यूथ कांग्रेस ने बैरिकेड्स तोड़े, जबकि पटना में कार्यकर्ताओं पर वॉटर कैनन का इस्तेमाल हुआ। यह प्रदर्शन केवल चुनाव आयोग के खिलाफ नहीं, बल्कि यह जताने के लिए था कि देश की सड़क की राजनीति पर आज भी कांग्रेस का ही वर्चस्व है।

आयोग की सफाई और विपक्ष का रुख बढ़ते बवाल के बीच चुनाव आयोग ने इसे संवैधानिक प्रक्रिया और आंतरिक मतभेद करार दिया। आयोग का तर्क है कि प्रक्रिया कानूनी नियमों के तहत हुई है। हालांकि, विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं है। कांग्रेस अब केवल इस्तीफे की नहीं, बल्कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के फैसलों की स्वतंत्र जांच की मांग पर अड़ गई है।

क्या CJP के आंदोलन का श्रेय ले पाएंगे राहुल? यह जंग सिर्फ चुनाव आयोग के खिलाफ नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर वर्चस्व की भी है। अभिजीत दिपके ने पुरानी पार्टियों को कटघरे में खड़ा किया था, जिसका जवाब राहुल गांधी ने अपने कैडर को सड़कों पर उतारकर दिया है। राहुल गांधी यह साबित करने की कोशिश में हैं कि सिस्टम से टकराने की असली ताकत केवल उनके पास है।

अब सबकी निगाहें 2 अक्टूबर पर टिकी हैं—जब CJP मुंबई में उतरेगी, तब तक क्या राहुल गांधी इस आंदोलन को पूरी तरह कांग्रेस ब्रांड में बदल चुके होंगे? यह देखना दिलचस्प होगा।

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