UNSC में भारत की स्थायी दावेदारी को मिली नई ताकत: पुर्तगाल के समर्थन से क्या बदलेंगे वैश्विक समीकरण?
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत को स्थायी सदस्यता दिलाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। 24 सितंबर को पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए भारत, ब्राजील और अफ्रीकी देशों को स्थायी सीट देने की पुरजोर वकालत की है। यह घटनाक्रम भारत की कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है।

UNSC और भारत की स्थिति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने वाली सबसे शक्तिशाली संस्था है। इसमें 5 स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन) हैं, जिनके पास वीटो पावर है। भारत का तर्क है कि 1945 में बनी यह संरचना अब पुरानी हो चुकी है। आज की ग्लोबल इकोनॉमी और शांति अभियानों में भारत का योगदान इतना बड़ा है कि परिषद में उसे नजरअंदाज करना अनुचित है।

पुर्तगाल का समर्थन क्यों है खास? पुर्तगाल का रुख इसलिए मायने रखता है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य जैसे यूरोप के अन्य देशों ने भी भारत का खुलकर समर्थन किया है। यह दर्शाता है कि वैश्विक मंच पर भारत की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। भारत अब G4 देशों (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) के साथ मिलकर इस सुधार के लिए दबाव बना रहा है।

स्थायी सदस्य बनने से क्या बदलेगा? यदि भारत को स्थायी सदस्यता मिलती है, तो वह वैश्विक सुरक्षा से जुड़े हर बड़े फैसले में एक स्थायी और अनिवार्य भागीदार होगा। यदि सुधार प्रक्रिया के दौरान भारत को वीटो पावर भी मिलती है, तो भारत का प्रभाव मौजूदा P5 देशों के बराबर हो जाएगा। इससे भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी नीतियों को और अधिक मजबूती से रख सकेगा।

सबसे बड़ी अड़चन क्या है? समर्थन मिलना एक बात है, लेकिन UNSC की संरचना बदलना बेहद जटिल है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना पड़ता है, जिसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति अनिवार्य है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नए सदस्यों को वीटो का अधिकार मिले या नहीं, और किन क्षेत्रों को कितना प्रतिनिधित्व दिया जाए—इन सवालों पर अभी भी सदस्य देशों के बीच गहरा मतभेद है।

निष्कर्ष पुर्तगाल और अन्य यूरोपीय देशों का समर्थन निश्चित रूप से भारत के पक्ष में एक सकारात्मक राजनीतिक संदेश है। हालांकि, यह किसी जादुई समाधान की तरह नहीं है, बल्कि एक लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। भारत के लिए अब अगली बड़ी चुनौती विभिन्न क्षेत्रीय गुटों के बीच आम सहमति बनाना है, ताकि 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप UNSC को पुनर्गठित किया जा सके।

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