यूएन का इस्तेमाल कर रहे सुधार विरोधी देश, जयशंकर ने दो टूक सुनाया आईना
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संयुक्त राष्ट्र (UN) की प्रासंगिकता पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तीखा प्रहार किया है। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें अधिवेशन के इतर एक सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो देश यूएन में सुधार का विरोध कर रहे हैं, उन्हें इस वैश्विक संस्था की वास्तव में कोई परवाह नहीं है। वे केवल अपने स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

सुधार न होने से बढ़ रही निराशा विदेश मंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यूएन को लेकर निराशा लगातार बढ़ रही है। मौजूदा यूएन आज की वैश्विक वास्तविकताओं के साथ कदमताल करने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि जो लोग वास्तव में यूएन को बचाना और चलाना चाहते हैं, वही इसमें बदलाव और सुधार की मांग कर रहे हैं।

लोकतांत्रिक तरीके से हो फैसला सुधार की प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए जयशंकर ने सर्वसम्मति की मजबूरी को खारिज किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का मतलब ही है बहुमत और मतदान। उन्होंने सुझाव दिया कि सुधार के लिए एक लिखित मसौदा तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें सभी देशों के विचार शामिल हों और अंत में लोकतांत्रिक तरीके से मतदान के जरिए निर्णय लिया जाए।

बदल रहा है ग्लोबल साउथ का रुख जयशंकर ने इस बात पर संतोष जताया कि ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) अब आपस में अधिक सहयोग करने के लिए उत्सुक हैं। उन्होंने कहा कि यह नई एकजुटता पुरानी निर्भरताओं को तोड़ रही है और दुनिया को अधिक लोकतांत्रिक बना रही है। उन्होंने यूएन महासचिव एंतोनियो गुतारेस के उस बयान का भी समर्थन किया जिसमें उन्होंने सुरक्षा परिषद के आधुनिकीकरण की वकालत की है।

भारत की दशकों पुरानी मांग भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में विस्तार की मांग कर रहा है। भारत का स्पष्ट तर्क है कि 1945 के ढांचे पर आधारित 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से कोसों दूर है। भारत ने अपनी स्थायी सदस्यता का दावा मजबूती से पेश किया है, क्योंकि वह मानता है कि बिना सुधार के यह वैश्विक संस्था अपनी विश्वसनीयता खो देगी।

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