सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इन दिनों विवादों के केंद्र में हैं। उन पर और उनकी पीठ के फैसलों पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि उनके बेटे सिद्धार्थ शर्मा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग (ECI) के स्टैंडिंग काउंसिल यानी सरकारी वकील हैं। इस जानकारी के सामने आने के बाद न्यायिक जगत और राजनीतिक गलियारों में हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर बहस छिड़ गई है।
विवाद के दो मुख्य बिंदु हैं। पहला, जस्टिस शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग के पैनल में होना। दूसरा, जस्टिस शर्मा द्वारा हाल ही में की गई दो महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई—एक CEC ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम से जुड़ा है और दूसरा चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित है।
रिपोर्टों के अनुसार, सिद्धार्थ शर्मा केवल चुनाव आयोग ही नहीं, बल्कि आयकर विभाग और CBDT के भी स्टैंडिंग काउंसिल हैं। आलोचकों का तर्क है कि जब कोई जज ऐसे संस्थान से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई करता है, जिसका कानूनी प्रतिनिधित्व उनका अपना बेटा कर रहा हो, तो न्यायिक औचित्य और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने 23 सितंबर को नोएडा की डीएम मेधा रूपम से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई की। मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं।
आरोप यह है कि यह मामला सामान्य रोस्टर के बजाय अलग तरीके से इस पीठ के सामने लाया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक छात्र की NSA हिरासत को गलत बताते हुए मेधा रूपम की भूमिका पर सख्त टिप्पणी की थी और 5 लाख रुपये हर्जाने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश की वसूली पर रोक लगा दी है, जिससे मामला और तूल पकड़ गया है।
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) से सवाल करते हुए कहा, न्यायपालिका संविधान से ऊपर नहीं है और निश्चित रूप से जांच से तो ऊपर बिल्कुल नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि चुनाव आयोग से जुड़े मामले में जस्टिस शर्मा कैसे सुनवाई कर सकते हैं, जबकि उनके पुत्र आयोग के पैनल में हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी इस मामले में असहमति जाहिर की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि क्या जस्टिस शर्मा को इन मामलों से खुद को अलग (Recuse) नहीं कर लेना चाहिए था, ताकि निष्पक्षता पर कोई आंच न आए।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अभी तक यह कहीं साबित नहीं हुआ है कि जस्टिस शर्मा के फैसलों पर उनके बेटे के पेशेवर संबंधों का कोई प्रभाव पड़ा है। विवाद का मुख्य केंद्र न्यायिक औचित्य की धारणा है।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का ऑडियो म्यूट किए जाने और मीडिया की पहुंच रोकने जैसी घटनाओं ने भी इस बहस को हवा दी है। हालांकि, कोर्ट ने बाद में स्पष्ट किया कि छात्र की NSA के तहत हिरासत रद्द करने वाला फैसला अभी भी बरकरार है। फिलहाल, यह मामला न्यायिक पारदर्शिता और नैतिकता के कड़े मानकों की कसौटी पर खड़ा है।
*India’s judiciary not above constitution & certainly not above scrutiny. Noida student challenged detention plea -listed before Justice Nagaratna with NSA roster. Same issue Gyanesh daughter plea assigned out of roster to Justice Sharma whose son is ECI’s standing counsel! pic.twitter.com/Gb9k2TkpY1
— Mahua Moitra (@MahuaMoitra) September 26, 2026
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