आर्कटिक की बदलती बिसात: ग्रीनलैंड में अमेरिकी मिलिट्री बेस के लिए ऐतिहासिक समझौता
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अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने एक नए रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा के समीकरणों को पूरी तरह बदल देगा। यह समझौता 1951 के पुराने रक्षा प्रोटोकॉल को आधुनिक युग की चुनौतियों के मुताबिक अपडेट करता है।

ट्रंप ने बताया ‘अद्भुत’ कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को अपनी एक बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता न केवल अमेरिका और डेनमार्क के रिश्तों को मजबूत करेगा, बल्कि ग्रीनलैंड के लिए भी अद्भुत साबित होगा। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि इस पर लंबे समय से काम चल रहा था, जो अब हकीकत में बदल गया है।

विरोधियों के लिए सख्त संदेश डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने स्पष्ट किया कि इस समझौते का बड़ा उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में बाहरी ताकतों के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। उन्होंने कहा कि इस समझौते के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी विरोधी देश को ग्रीनलैंड में पैर जमाने का मौका न मिले। यह नाटो (NATO) को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।

ग्रीनलैंड की भूमिका और अधिकार ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने इस समझौते को साझे जिम्मेदारी का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि 1951 के समझौते को 2026 के दौर के अनुकूल बनाया गया है। अब, ग्रीनलैंड की जमीन और वहां के लोगों से जुड़े फैसलों में ग्रीनलैंड की सीधी भागीदारी होगी। निल्सन ने इसे ग्रीनलैंड के आत्म-निर्णय और विकास के लिए एक बड़ी उपलब्धि करार दिया है।

क्या ग्रीनलैंड पर मालिकाना हक का मुद्दा खत्म? जब पत्रकारों ने ट्रंप से पूछा कि क्या ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर मालिकाना हक जताने की चर्चा अब बंद हो गई है, तो उन्होंने इसका सीधा जवाब देने से परहेज किया। हालांकि, उन्होंने ग्रीनलैंड के लोगों के प्रति अपना प्रेम जाहिर करते हुए कहा कि उनके प्रधानमंत्री उनका बेहतरीन प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

सुरक्षा का नया अध्याय यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब आर्कटिक में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है। 75 साल पुराने संबंधों को आधुनिक सैन्य ढांचे में ढालकर, अमेरिका और उसके सहयोगी अब इस बर्फीले क्षेत्र में अपनी पकड़ और मजबूत करने की तैयारी कर चुके हैं।

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