अनफिट इंडिया: रिहैब से लौटते ही क्यों टूट रहे हैं भारतीय खिलाड़ी? बीसीसीआई का सिस्टम फेल या जल्दबाजी की सजा?
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भारतीय क्रिकेट में इन दिनों एक अजीब सा ट्रेंड देखने को मिल रहा है। स्टार स्पिनर वरुण चक्रवर्ती हों या तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह—खिलाड़ी हफ्तों तक बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) में रिहैब करते हैं, लेकिन मैदान पर लौटते ही दोबारा चोटिल हो जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर हमारा फिटनेस सिस्टम कहां चूक रहा है?

मशीन नहीं हैं खिलाड़ी , वर्कलोड का भारी बोझ

आधुनिक क्रिकेट का कैलेंडर बहुत व्यस्त है। खिलाड़ी साल के 12 महीने तीनों फॉर्मेट और आईपीएल के दबाव में खेल रहे हैं। पूर्व दिग्गज सुनील गावस्कर पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि खिलाड़ियों को गन्ने की तरह निचोड़ा नहीं जा सकता। सीरीज दर सीरीज खेलने के कारण शरीर को रिकवरी का समय ही नहीं मिल रहा है।

रिकवरी मैनेजमेंट में भारी लापरवाही

चोट से ज्यादा खतरनाक है खिलाड़ी का अधूरी फिटनेस के साथ मैदान पर उतरना। स्पोर्ट्स साइंस के जानकारों के अनुसार, भारत में समस्या फिटनेस की नहीं, रिकवरी मैनेजमेंट की है। मैचों के बीच मांसपेशियों को जो थेरेपी मिलनी चाहिए, वह न मिलने से खिलाड़ी कमजोर हो जाते हैं। जल्दबाजी में उन्हें मैदान पर उतारना उनके करियर के लिए घातक साबित हो रहा है।

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस निशाने पर

बीसीसीआई के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इसका मुख्य कारण नेतृत्व का अभाव है। हेड ऑफ स्पोर्ट्स साइंस एंड मेडिसिन का पद मार्च 2025 से खाली है। इसके अलावा, मेडिकल स्टाफ, चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट के बीच कम्युनिकेशन गैप इतना बढ़ गया है कि अनफिट खिलाड़ियों को भी समय से पहले ग्रीन सिग्नल मिल जाता है।

पुराने पड़ चुके हैं फिटनेस मानक (SOP)

बीसीसीआई ने 2023 में जो एसओपी (SOP) फिटनेस जांच के लिए बनाए थे, वे अब अपडेट नहीं हुए हैं। ये टेस्ट सिर्फ यह देखते हैं कि खिलाड़ी अभी मैच खेल सकता है या नहीं, न कि यह कि वह लंबे समय तक फिट रहने में सक्षम है या नहीं। साथ ही, हर फॉर्मेट (टेस्ट, वनडे, टी20) के लिए अलग तरह की फिजिकल ट्रेनिंग की कमी भी खिलाड़ियों के शरीर पर बुरा असर डाल रही है।

ऑस्ट्रेलिया जैसा सख्त रवैया क्यों नहीं?

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड अपने खिलाड़ियों को लेकर बहुत कड़क है। पैट कमिंस जैसे खिलाड़ियों को चोट लगने पर एशेज जैसी बड़ी सीरीज में भी रिस्क नहीं लेने दिया जाता और जबरन आराम दिया जाता है। विदेशी बोर्ड अपने सितारों को फ्रेश रखने के लिए आईपीएल जैसी लीग्स से भी दूर रखने की हिम्मत रखते हैं।

निष्कर्ष: भारतीय क्रिकेट की सफलता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि मैदान पर टिके रहने वाले खिलाड़ियों पर टिकी है। बीसीसीआई को अब जल्दबाजी छोड़नी होगी और विदेशी बोर्ड्स की तरह खिलाड़ियों को जबरन आराम देने जैसे कड़े फैसले लेने होंगे। अगर सिस्टम नहीं सुधरा, तो भारत के सबसे बेहतरीन मैच-विनर्स का करियर समय से पहले ही खत्म हो जाएगा।

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