मसूद अजहर पर पाकिस्तान का नया नाटक: क्या FATF के दबाव में रची गई 70 लाख के इनाम की साजिश?
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पाकिस्तान ने एक बार फिर आतंक के सरगना मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई का ढोंग रचा है। पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने अपनी 2026 की रेड बुक में जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को मोस्ट वांटेड घोषित करते हुए उस पर इनाम की राशि 50 लाख से बढ़ाकर 70 लाख पाकिस्तानी रुपये कर दी है।

FATF की बैठक से पहले यह कदम क्यों? जानकारों का मानना है कि यह कार्रवाई अक्टूबर में होने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की प्लेनरी बैठक से ठीक पहले की गई है। पाकिस्तान पर आतंकवाद के वित्तपोषण को लेकर अंतरराष्ट्रीय निगरानी बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह दिखाने के लिए कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ सक्रिय है, यह इनाम बढ़ाना महज एक दिखावा माना जा रहा है।

मसूद अजहर: भारत का गुनहगार मसूद अजहर का नाम भारत के सबसे घातक आतंकी हमलों में शामिल रहा है। 1999 में IC-814 विमान अपहरण के बाद यात्रियों की रिहाई के बदले उसे छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उसने जैश-ए-मोहम्मद खड़ा किया। 2001 का संसद हमला हो, 2016 का पठानकोट एयरबेस हमला या 2019 का पुलवामा आतंकी हमला—इन सभी की साजिशों में अजहर का नाम मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आता रहा है।

पाकिस्तान का पुराना सफेद झूठ पाकिस्तान का दोहरा चेहरा यहाँ साफ़ नजर आता है। 2021 से पाकिस्तान लगातार यह दावा करता रहा है कि मसूद अजहर उसके देश में नहीं है और वह अफगानिस्तान भाग गया है। अब उसी मसूद अजहर पर इनाम बढ़ाकर पाकिस्तान खुद ही अपने पिछले दावों की पोल खोल रहा है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के तकनीकी विश्लेषणों के अनुसार, अजहर के पाकिस्तान में ही सुरक्षित पनाहगाह में होने की प्रबल संभावनाएं हैं।

26/11 के गुनहगारों पर भी फोकस FIA की इस नई रेड बुक में केवल अजहर ही नहीं, बल्कि 26/11 मुंबई हमलों से जुड़े 19 अन्य आतंकियों के नाम भी शामिल हैं। इनमें लश्कर-ए-तैयबा के वे लोग शामिल हैं जिन्होंने हमलावरों को समुद्री रास्ते से भेजने, लॉजिस्टिक सपोर्ट और आर्थिक मदद दी थी।

क्या यह कार्रवाई वास्तविक है? पाकिस्तान द्वारा इनाम बढ़ाने के बावजूद गंभीर सवाल अब भी कायम हैं—क्या पाकिस्तान सच में मसूद अजहर को गिरफ्तार करने का साहस जुटा पाएगा? इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान ने ऐसे मोस्ट वांटेड आतंकियों को केवल दिखावे की सूची में ही रखा है, जबकि हकीकत में वे उसकी सुरक्षा एजेंसियों की छत्रछाया में पलते रहे हैं। यह कदम केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने की एक कूटनीतिक चाल भर नजर आता है।

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