BRICS डिनर और थाली की जंग: क्या वाकई मांसाहार भारत का असली खाना नहीं?
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नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित BRICS समिट के गाला डिनर में परोसे गए विशुद्ध शाकाहारी मेन्यू ने एक पुरानी बहस को फिर से हवा दे दी है। इस डिनर में खांडवी, पनीर लबाबदार और खुंब गलौटी जैसे व्यंजन शामिल थे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर इस पर प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि 80% भारतीय मांसाहारी हैं।

इस दावे के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पलटवार करते हुए कहा कि मेहमानों ने भारतीय शाकाहारी व्यंजनों का आनंद लिया। वहीं, बागेश्वर बाबा धीरेंद्र शास्त्री का दुर्गा पूजा के दौरान नॉनवेज पर रोक लगाने का बयान इस विवाद में नई आग की तरह काम कर रहा है।

प्राचीन इतिहास और मांस का चलन इतिहास गवाह है कि भारत का भोजन कभी भी केवल शाकाहारी नहीं रहा। हिस्टोरिसिटी रिसर्च जनरल की रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में गाय, भेड़ और मछली की हड्डियां मिली हैं। कई इतिहासकारों का मानना है कि वैदिक काल में मांस और गोमांस का सेवन प्रचलित था।

UCLA की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शाकाहार का उदय बौद्ध और जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांतों के साथ छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुआ। यानी शाकाहार भारत का मूल स्वभाव नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित हुई एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है।

क्या राहुल गांधी का 80% वाला दावा सही है? नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के आंकड़े राहुल गांधी के दावे के काफी करीब हैं। सर्वे के अनुसार, भारत में लगभग 80% लोग (15-49 आयु वर्ग) मांस, मछली या अंडे का सेवन करते हैं।

राज्यों के आधार पर यह अंतर बहुत अधिक है। नागालैंड में 99% से अधिक लोग मांसाहारी हैं, जबकि राजस्थान में करीब 71% लोग शाकाहारी हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान को छोड़ दिया जाए, तो भारत के अधिकांश राज्यों में मांसाहार का ही बोलबाला है।

गैस्ट्रो-पॉलिटिक्स : थाली से तय होती है सामाजिक स्थिति? समाजशास्त्री अर्जुन अप्पडुराई के अनुसार, भारत में खाना गैस्ट्रो-पॉलिटिक्स का एक बड़ा हिस्सा है। भीमराव आंबेडकर जैसे विद्वानों का तर्क रहा है कि भारत में शाकाहार को शुद्धता और उच्च वर्ग से जोड़कर सामाजिक नियंत्रण के रूप में इस्तेमाल किया गया।

आज भी कई रिहायशी सोसाइटियों में शाकाहारी ओनली की शर्त या शैक्षणिक परिसरों में नॉनवेज पर पाबंदी को आलोचक फूड-बेस्ड अपार्थीड या भोजन के आधार पर भेदभाव मानते हैं। त्योहारों पर मीट की बिक्री पर रोक को भी अक्सर बहुसंख्यकवाद के रूप में देखा जाता है।

विविधता ही भारत की असली पहचान फूड क्रिटिक पुष्पेश पंत का मानना है कि जिसे हम असली भारतीय खाना कहते हैं, वह असल में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का मिश्रण है। उत्तर भारत की गेहूं और डेयरी आधारित डाइट, तटीय क्षेत्रों का समुद्री भोजन, कश्मीर का वाज़वान या दक्षिण का तीखा मांसाहार—सब मिलकर भारत की पाक कला को पूरा करते हैं।

इस पूरे विवाद का निचोड़ यह है कि भारत में न तो केवल शाकाहार का एकाधिकार है और न ही मांसाहार की कोई एक परिभाषा। सियासत चाहे खाने को अपनी पहचान की लड़ाई बना ले, लेकिन भारत की असली थाली वही है जिसमें विविधता के साथ हर किसी की पसंद के लिए जगह हो।

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