ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न: पुतिन की भारत यात्रा और वैश्विक मंच पर प्रतिबंधों के खिलाफ हुंकार
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नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन के बाद, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रविवार को वापस अपने देश रवाना हो गए। भारत की अध्यक्षता में हुए इस दो दिवसीय कार्यक्रम में वैश्विक कूटनीति के कई महत्वपूर्ण रंग देखने को मिले।

प्रतिबंधों पर पुतिन का कड़ा तेवर सम्मेलन के दौरान पुतिन ने पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए लगभग 30,000 प्रतिबंधों का जिक्र करते हुए तीखा हमला बोला। ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्थिक हथकंडों का इस्तेमाल किसी देश की संप्रभुता को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने इन प्रतिबंधों को राजनीतिक दबाव बताते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष रखने की पुरजोर वकालत की।

बहुध्रुवीय अर्थव्यवस्था की वकालत रूसी राष्ट्रपति ने वर्तमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार की मांग की। उन्होंने कहा कि दुनिया को अब कुछ सीमित शक्तियों पर निर्भर रहने के बजाय अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय ढांचे की ओर बढ़ने की जरूरत है। पुतिन ने सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने पर जोर दिया ताकि भविष्य में किसी भी बाहरी आर्थिक दबाव से बचा जा सके।

मोदी-पुतिन वार्ता: रणनीतिक रिश्तों को मजबूती पुतिन की यात्रा का एक मुख्य आकर्षण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक रही। बैठक में दोनों नेताओं ने दशकों पुराने भारत-रूस रणनीतिक संबंधों की गहराई से समीक्षा की। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच, दोनों देशों ने यह संदेश दिया कि वे अपने आपसी हितों, तकनीकी सहयोग और राजनीतिक संवाद को बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

भारत इनोवेट्स में दिलचस्पी अपनी व्यस्तता के बीच राष्ट्रपति पुतिन ने भारत इनोवेट्स प्रदर्शनी का भी दौरा किया। यहां उन्होंने भारत की तकनीकी प्रगति और नवाचारों को करीब से देखा। इसे भारत और रूस के बीच भविष्य में तकनीकी साझेदारी और रक्षा व ऊर्जा से इतर सहयोग के नए क्षेत्रों को तलाशने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

निष्कर्ष: ब्रिक्स का बढ़ता प्रभाव भारत की अध्यक्षता में संपन्न हुआ यह 18वां शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब पूरी दुनिया आर्थिक अनिश्चितता से गुजर रही है। ब्रिक्स मंच से सामने आए पुतिन के विचार और भारत के साथ उनकी मुलाकात यह दर्शाती है कि आने वाले समय में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह वैश्विक राजनीति में अपनी आवाज और मुखर करने वाला है।

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