हरीश रावत का इस्तीफा ड्रामा : सियासी चाल या सिर्फ गलतफहमी?
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उत्तराखंड की राजनीति में उस समय हड़कंप मच गया जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के नाम से उनके पदों से इस्तीफे की खबर सामने आई। हालांकि, कुछ ही घंटों बाद रावत ने इस पर सफाई देकर इसे गलतफहमी करार दिया। राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इस घटना ने सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या थी पूरी घटना?

मामले की शुरुआत तब हुई जब हरीश रावत के करीबी सहयोगी चंदन सिंह जीना के घर पर ईडी की छापेमारी में भारी मात्रा में नकदी मिलने की खबरें आईं। इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हुआ, जिसमें रावत ने कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी और एआईसीसी की वर्किंग कमेटी से इस्तीफा देने की बात कही।

उन्होंने तर्क दिया था कि यदि उनकी वजह से पार्टी की छवि या भ्रष्टाचार विरोधी नैरेटिव पर कोई असर पड़ता है, तो वे इन पदों पर नहीं रहेंगे।

यू-टर्न और सफाई

इस्तीफे की चर्चाओं के जोर पकड़ते ही हरीश रावत ने खुद स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा, कांग्रेस पार्टी की सदस्यता मेरे खून और हड्डियों में है, यह मेरे साथ स्वर्ग तक जाएगी। उन्होंने साफ किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि केवल उन पदों से हटने की पेशकश की थी, जो विवाद की स्थिति में पार्टी को कमजोर कर सकते थे। उन्होंने लोगों से सोशल मीडिया पोस्ट को गलत समझने की बात कही।

कौन हैं हरदा और उनका कद?

78 वर्षीय हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा हैं। उन्हें समर्थकों के बीच हरदा के नाम से जाना जाता है। पांच दशकों के लंबे राजनीतिक सफर में वे इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक की पीढ़ी के करीबी रहे हैं। अल्मोड़ा से अपने करियर की शुरुआत करने वाले रावत ने 1980 में मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेता को हराकर अपनी धमक दिखाई थी।

वह पांच बार सांसद रहे हैं और केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक अपनी पकड़ मजबूत की है।

2016 का संकट और संकटमोचक की छवि

हरीश रावत के करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर 2016 में आया, जब राज्य में संवैधानिक संकट के दौरान कांग्रेस के 9 विधायक बागी हो गए थे। केंद्र में मोदी सरकार थी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। कानूनी लड़ाई और फ्लोर टेस्ट के जरिए रावत ने बहुमत साबित कर अपनी सत्ता बचाई थी।

यह घटना उनके राजनीतिक कौशल और धैर्य का सबसे बड़ा प्रमाण मानी जाती है। अब सवाल यह है कि क्या यह इस्तीफा प्रकरण भी रावत की किसी गहरी राजनीतिक चाल का हिस्सा था, या केवल आगामी चुनावों से पहले खुद को पाक-साफ साबित करने की कवायद? जो भी हो, इस ड्रामे ने उत्तराखंड की सियासत को एक बार फिर गरमा दिया है।

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